
हुब्बल्ली. वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में आयोजित चातुर्मासिक धर्मसभा आध्यात्मिक चेतना, तप और आत्मकल्याण के संदेश से ओतप्रोत रही। धर्मसभा को संबोधित करते हुए डॉ. समीक्षाप्रभा ने कहा कि आत्मकल्याण का वास्तविक मार्ग सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र से होकर ही गुजरता है। आत्मा के बिना शरीर का कोई अस्तित्व नहीं और संयम के बिना जीव का उद्धार संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि जिनवाणी का मनन, आत्मचिंतन और आत्मविश्लेषण ही जीवन की जटिल समस्याओं का स्थायी समाधान प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि धर्ममार्ग पर चलने वाला व्यक्ति दोहरे आचरण से सदैव दूर रहता है। धर्म और सांसारिक दायित्वों के बीच संतुलन स्थापित करते हुए सत्य, संयम और सदाचार का पालन करना ही सफल एवं सार्थक जीवन की पहचान है। पूर्वजों से प्राप्त संस्कार तथा जिनवाणी का अनुसरण मनुष्य को आत्मोन्नति की दिशा में अग्रसर करता है। धर्मसभा में डॉ. दर्शनप्रभा ने युवाओं में धर्म के प्रति आस्था, नैतिक मूल्यों और श्रेष्ठ संस्कारों के संवर्धन पर बल देते हुए कहा कि भगवान महावीर, आचार्यों और गुरु भगवंतों के आदर्शों को जीवन में अपनाना ही सच्चे धर्म की पहचान है। उन्होंने कहा कि निष्कपट, पारदर्शी और कथनी-करनी में समानता रखने वाला जीवन ही वास्तविक साधना है तथा धर्म के नाम पर दिखावा या दोहरा व्यवहार कभी स्वीकार्य नहीं हो सकता। साध्वी इंदुप्रभा के पावन सान्निध्य में डॉली अरिहंत बोहरा ने नौ दिवसीय तपस्या के पच्चखान ग्रहण किए। इस अवसर पर बोहरा परिवार सहित बाहरगांव से आए अनेक श्रद्धालुओं एवं दर्शनार्थियों ने उपस्थित होकर तप आराधना का अनुमोदन किया। संघ के अध्यक्ष उकचंद बाफना ने सभी श्रावक-श्राविकाओं से चातुर्मास के दौरान अधिकाधिक तप, स्वाध्याय और आराधना से जुडऩे का आह्वान किया। कार्यक्रम का संचालन संघ के मंत्री प्रकाश कटारिया ने किया।