
जयपुर। राजधानी में एक परिवार ने अपनों को खोने के गहरे दुख के बीच ऐसा फैसला लिया, जिसने किसी और के जीवन में उम्मीद की नई किरण जगा दी। जमवारामगढ़ निवासी 83 वर्षीय भौंरीलाल मीणा के डॉक्टर बेटे और बहू ने उनके निधन के बाद अंगदान का निर्णय लेकर समाज को प्रेरक संदेश दिया। इस पहल से एक मरीज को नया जीवन मिल सका।
जानकारी के अनुसार, भौंरीलाल मीणा को ब्रेन हेमरेज होने के बाद एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। लगातार इलाज के बावजूद उनकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ। इसके बाद उनके बेटे डॉ. बाबूलाल मीणा और पुत्रवधू डॉ. शशि मीणा, जो दोनों चिकित्सक हैं, उन्होंने अंगदान का संकल्प लिया। उन्होंने स्वयं एसएमएस अस्पताल की ट्रांसप्लांट टीम से संपर्क कर पूरी प्रक्रिया शुरू कराई।
एसएमएस अस्पताल के चीफ ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर रामप्रसाद मीणा ने बताया कि 11 जुलाई को भौंरीलाल मीणा को ट्रॉमा सेंटर के आईसीयू में भर्ती किया गया था। निर्धारित मेडिकल प्रोटोकॉल पूरा होने के बाद चिकित्सकों ने उन्हें ब्रेन डेड घोषित किया। इसके बाद परिजनों ने किडनी, लिवर, फेफड़े सहित सभी उपयोगी अंग दान करने की सहमति दे दी।
अंग प्रत्यारोपण की प्रक्रिया के तहत फेफड़ों की संभावनाओं का आकलन करने के लिए चेन्नई से पांच सदस्यीय विशेषज्ञ टीम भी जयपुर पहुंची। हालांकि, विस्तृत चिकित्सकीय जांच में लिवर और फेफड़े प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त नहीं पाए गए। इसके बाद दोनों किडनियों को सुरक्षित निकाला गया।
चिकित्सकों के अनुसार, दोनों किडनियां आकार में अपेक्षाकृत छोटी थीं। इसी वजह से सोटो (SOTTO) की गाइडलाइन के अनुरूप दोनों किडनियों को टोंक रोड स्थित एक निजी अस्पताल भेजा गया, जहां दोनों किडनियों का एक ही मरीज में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपण किया गया। इस सफल प्रत्यारोपण से मरीज को नया जीवन मिला।
अंगदान की पूरी प्रक्रिया के दौरान एसएमएस अस्पताल के अधीक्षक डॉ. मृणाल जोशी सहित ट्रांसप्लांट टीम के चिकित्सक मौजूद रहे। विशेषज्ञों ने बताया कि अंगदान केवल किसी एक मरीज का इलाज नहीं, बल्कि कई परिवारों के लिए उम्मीद का माध्यम बन सकता है।
भौंरीलाल मीणा के परिवार का यह निर्णय ऐसे समय में सामने आया है, जब देशभर में अंगदान के प्रति लोगों को जागरूक करने के प्रयास किए जा रहे हैं। अपने पिता को खोने के दर्द के बावजूद डॉक्टर बेटे और बहू ने मानवता को सर्वोपरि रखते हुए अंगदान का फैसला लिया। उनका यह कदम न केवल एक मरीज के लिए जीवनदायी साबित हुआ, बल्कि समाज को यह संदेश भी दे गया कि मृत्यु के बाद भी किसी के अंग किसी दूसरे व्यक्ति को नई जिंदगी दे सकते हैं।