
जयपुर। सरकारी अस्पतालों में गर्भवती और प्रसूताओं की लगातार हो रही मौतों ने राजस्थान की मातृ स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए है। मई में कोटा से शुरू हुआ मौतों का सिलसिला जुलाई में भीलवाड़ा, बांसवाड़ा और बीकानेर तक पहुंच गया। लगभग हर मामले में परिजनों ने इलाज में लापरवाही, समय पर विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं मिलने, रेफरल व्यवस्था की खामियों और संवेदनहीन व्यवहार के आरोप लगाए है। कई मामलों में मौत के कारणों को लेकर परिवारों को अब तक स्पष्ट जानकारी भी नहीं मिल सकी है।
सरकार ने अलग-अलग मामलों में एनीमिया, हाई ब्लड प्रेशर, प्लेटलेट्स कम होना, किडनी फेल होना, फेफड़ों में रक्त का थक्का और अन्य चिकित्सकीय कारण बताए है। दूसरी ओर परिजनों का सवाल है कि यदि समय पर समुचित इलाज और निगरानी मिलती तो क्या उनकी बेटी, बहू या पत्नी आज जीवित होती? मां बनने का सपना लेकर अस्पताल पहुंचीं इन महिलाओं के नवजात अब दादा-दादी, नाना-नानी, मौसी या बुआ की गोद में पल रहे हैं। अधिकांश परिवार आज भी निष्पक्ष जांच, दोषियों पर कार्रवाई और नवजातों के पालन-पोषण के लिए सरकारी सहायता की मांग कर रहे है।
1. मौत की असली वजह क्या थी?
2. इलाज में कहीं चूक हुई तो जिम्मेदार कौन?
3. जिन नवजातों में जन्म लेते ही मां खो दी, उनकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
बीकानेर की रामपुरा बस्ती की शारदा ने चार जून को पुत्र को जन्म दिया। करीब अड़तालीस घंटे तक नवजात मां के आंचल से चिपका रहा। इसके बाद शारदा की तबीयत बिगड़ने लगी और वह कोमा में ही चलीं गईं। जहां 21 जून को उसकी मौत हो गई। परिजनों ने इलाज में लापरवाही का आरोप लगाते हुए तीन दिन तक शव नहीं उठाया।
बांसवाड़ा के पातेला पांडा क्षेत्र की लक्ष्मी (31) का आठ माह की गर्भावस्था में समय से पहले प्रसव कराया गया। 7 जुलाई को जन्म के कुछ देर बाद नवजात की मौत और कुछ घंटे बाद मां भी जिंदगी हार गई।
बीकानेर की कमला के 8 जून को सिजेरियन के बाद लंबे समय तक बेहोश रहीं। होश आने पर नवजात बेटी को दिखाया गया। फिर वह कभी बेटी को नहीं देख सकीं और 14 जुलाई को मौत हो गई।
भीलवाड़ा की संगीता जीनगर को 9 जुलाई को भर्ती कराया। 10 जुलाई को प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्त्राव से जान चली गई। नवजात बेटी को बुआ अनिता सीने से लगाए हुए है।
कोटा के अनंतपुरा निवासी पायल (27) की बेटे को जन्म देने के कुछ समय बाद ही तबीयत बिगड़ गई। पति पवन मालवीय का आरोप है कि हालत गंभीर होने के बावजूद समय पर उपचार नहीं मिला। जल्द शव ले जाने का दबाव बनाया गया। आज नवजात अपनी मां के बिना बड़ा हो रहा है।
कोटा के अनंतपुरा निवासी ज्योति वर्मा (20) पहली बार मां बनने वाली थीं। पति रवि का आरोप है कि ज्योति पूरी रात दर्द से तड़पती रही, लेकिन इलाज का भरोसा दिया जाता रहा। सुबह गंभीर बताकर कुछ देर बाद मौत की सूचना दे दी गई। परिवार ने मामला दर्ज कराया है।
सिजेरियन से बेटे को जन्म देने के अगले ही दिन बूंदी निवासी प्रिया की मौत हो गई। पति रोहित का आरोप है कि डॉक्टरों ने हालत बिगड़ने की समय पर जानकारी नहीं दी और सीधे पुलिस बुला ली। परिवार जांच की मांग कर रहा है।
कोटा के डीसीएम श्रीराम नगर कॉलोनी निवासी पिंकी महावर (20) की जेके लोन अस्पताल में बेटे को जन्म देने के बाद हालत बिगड़ने पर मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया। परिजनों का आरोप है कि वेंटिलेटर एम्बुलेंस समय पर नहीं मिली और इसी देरी में पिंकी की जान चली गई।
रायपुर से 7 जुलाई को रेफर होकर आई दिव्या सेन ने ऑपरेशन के जरिए बेटी को जन्म दिया। 9 जुलाई को हाई बीपी, लिवर एंजाइम बढ़ने, प्लेटलेट्स गिरने और जटिलताओं के चलते उसकी सांसें थम गई। जन्म लेते ही बिन मां की हुई बच्ची को अब नानी और मामी का ही सहारा है।
भीलवाड़ा के गुलाबपुरा से रेफर होकर आई शिमला के गर्भ में ही भ्रूण की मौत हो चुकी थी। परिजनों का आरोप है कि समय पर समुचित उपचार नहीं मिला। खून की कमी के चलते 7 जुलाई को शिमला ने तड़पते हुए दम तोड़ दिया।
ऑपरेशन से 6 जुलाई को बेटे को जन्म देने के दो दिन बाद भीलवाड़ा निवासी ईशा की मौत हो गई। परिवार के अनुसार अब नवजात की परवरिश उसकी मौसी कर रही है। पति ने जिला कलक्टर को ज्ञापन देकर न्याय की गुहार लगाई है।
बच्चेदानी के ऑपरेशन के लिए भर्ती हुई भीलवाड़ा की फोरी देवी की हृदयाघात से मौत हो गई। परिवार को उम्मीद थी कि ऑपरेशन के बाद वह स्वस्थ होकर घर लौटेंगी, लेकिन 7 जुलाई को अचानक सांसें थम गई।