
अश्विनी भदौरिया . जयपुर। स्वच्छता सर्वेक्षण शुरू होने में अब कुछ ही दिन बचे है, लेकिन अब तक न महापौर सक्रिय हुए हैं और न ही नगर निगम के अधिकारी। स्वच्छ सर्वेक्षण के नोडल अधिकारी और मोबाइल एप के अधिकारियों के भरोसे ही स्वच्छ सर्वेक्षण का काम चल रहा है। जिन दो कैटेगरी के लिए नगर निगम ने आवेदन किया है, उनको अब तक जमीनी स्तर पर काम ही शुरू नहीं हो पाया है। ऐसे में निगम पर रैंकिंग में सुधार का दबाव लगातार बना हुआ है। पिछली बार स्वच्छता रैंकिंग में जयपुर की 39वीं रैंक थी। पहली बार जयपुर का स्थान 215वां था। महापौर और निगम के आला अधिकारियों की सर्वेक्षण में रुचि न होने की वजह से इस बार रैंकिंग सुधार में गुंजाइश कम ही दिखाई दे रही है। स्थिति यह है कि अब तक गंदगी करने वालों पर भी निगम में कार्रवाई करना शुरू नहीं किया है। वहीं सर्वेक्षण के नोडल अधिकारी विनोद पुरोहित का दावा है कि पिछली बार से इस बार रैंकिंग में सुधार आएग और हम टॉप-10 में जगह पाने में कामयाब होंगे।
क्यों बना रखी है दूरी
महापौर
अशोक लाहोटी विधायक बन चुके हैं। ऐसे में निगम में उनके कुछ दिन ही बचे हैं। वे निगम आ जरूर रहे हैं, लेकिन स्वच्छता सर्वेक्षण को लेकर किसी भी अधिकारी से कोई बातचीत नहीं कर रहे। ऐसे में नए साल में शुरू हो रहे स्वच्छता सर्वेक्षण में रुचि नए महापौर ही दिखा पाएंगे?
अधिकारी
सत्ता बदलने के बाद तबादलों का दौर शुरू हो गया है। ऐसे में पहली लिस्ट में अतिरिक्त आयुक्त का तबादला हो गया है। अन्य अधिकारियों को भी लग रहा है कि निगम में ज्यादा दिन नहीं रुक पाएंगे। ऐसे में अधिकारी किसी भी योजना में गंभीरता नहीं दिखा रहे हैं और पुराने ढर्रे पर ही काम चल रहा है।
इनमें किया है आवेदन
-थ्री स्टार कैटेगरी-इसमें पूरा शहर कचरा मुक्त हो चुका है। हर घर से गाडिय़ां कचरा उठाकर डम्पिंग जोन तक ले जा रही हैं। शहर के डिपो खत्म हो चुके हैं।
-ओडीएफ प्लस- टॉयलेट हैं। पानी की उचित व्यवस्था है। बाजारों में यूरिनल व्यवस्थित हैं। व्यापारी और ग्राहक इनका उपयोग कर रहे हैं या नहीं।
(टीम आने के बाद इन सभी व्यवस्थाओं को देखेगी)
वहीं पत्रिका की टीम ने जब इसकी पड़ताल की तो नतीजे चौंकाने वाले थे। कहीं टॉयलेट पर ताला लटक रहा था तो कहीं सड़क पर कचरा पड़ा था। सवाल यही था कि ऐसी स्थिति में कैसे रैंकिंग में सुधार आ पाएगा।
अभी तो माहौल बनना ही शुरू नहीं हुआ
चार जनवरी से शहर में शहरी विकास मंत्रालय की टीम आकर काम शुरू कर देगी, लेकिन अब तक न तो जन भागीदारी हुई है और न ही अधिकारियों की ओर से कोई प्रयास किए जा रहे हैं। सर्वेक्षण से जुड़े अधिकारी इस बात को मानते हैं कि हर 50 से 100 मीटर की दूरी पर सफाई से जुड़ा हुआ संदेश लिखा होना चाहिए, लेकिन अब तक शहर में ऐसा कहीं भी नहीं दिखाई देता है। जहां दिखता है वो स्लोगन पिछले साल के हैं।
प्लानिंग से बाहर नहीं निकल पाई सफाई व्यवस्था
पिछली बार रैंकिंग में सुधार नियमित सफाई और निगम की सक्रियता से आया था, लेकिन इस बार ऐसा नहीं दिखाई दे रहा है। अभी तक सामान्य सफाई व्यवस्था ही चल रही है। दो शिफ्टों में शहर की सफाई व्यवस्था बंटी हुई है।
आए दिन नहीं आता हूपर
जिस तरह से निगम और सफाई कम्पनी के बीच भुगतान को लेकर जिस तरह से विवाद बढ़ता जा रहा है। उससे सफाई व्यवस्था प्रभावित होती है। आए दिन हूपर नहीं आते। इससे घरों में कचरा रह जाता है।
इंदौर: ऐसे ही नहीं है ताज बरकरार
वहां का नगर निगम प्लानिंग के साथ काम कर रहा है। तीसरी बार ताज बरकरार रखने के लिए पांच बिदुंओं पर काम किया जा रहा है। इसमें हरियाली, पुलों पर चित्रकारी, तालाब किनारे लाइटिंग के साथ-साथ चौराहों पर स्मार्ट प्वॉइंट बनाने की बात कही है।