
Rajasthan Local Body Election 2026 Slipper Symbol Controversy -PIC
राजस्थान में नगरीय निकाय चुनाव 2026 के लिए जैसे ही निर्दलीय उम्मीदवारों को चुनाव चिह्नों का आवंटन किया गया, वैसे ही राज्य के कई प्रमुख जिलों में एक बहुत ही अजीब विवाद खड़ा हो गया। राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से उपलब्ध कराए गए मुक्त चुनाव चिह्नों की सूची में शामिल 'चप्पल' (Slipper) सिंबल आवंटन को लेकर निर्दलीय प्रत्याशियों ने भारी नाराजगी जताई है। बूंदी और दौसा जैसे बड़े नगर निकायों में यह विवाद इतना अधिक बढ़ गया कि नाराज उम्मीदवारों को शांत करने के लिए कलेक्ट्रेट परिसरों में भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा।
निर्दलीय प्रत्याशियों का तर्क है कि भारतीय समाज में 'चप्पल' को शुभ नहीं माना जाता है और इसे हाथ में लेकर या इसका बोर्ड बनाकर जनता के बीच वोट मांगने जाना उनके लिए हंसी और तंज का पात्र बनने जैसा है। प्रत्याशियों ने आरोप लगाया है कि फॉर्म में अपनी तरफ से दी गई प्राथमिकताओं को नजरअंदाज करके प्रशासन ने जबरन उन्हें यह सिंबल थमाया है। दूसरी तरफ, प्रशासन और निर्वाचन अधिकारियों का कहना है कि वे आयोग की तय नियमावली और वर्णानुक्रम (Alphabetical Order) के अनुसार ही काम कर रहे हैं, जिससे इस मुद्दे ने प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से बड़ा तूल पकड़ लिया है।
बूंदी नगर परिषद के कुल 60 वार्डों में से वार्ड नंबर 55, 56, 43, 20 और 11 के निर्दलीय उम्मीदवारों को जब 'चप्पल' सिंबल आवंटित होने की सूचना मिली, तो कलेक्ट्रेट परिसर में हंगामा शुरू हो गया। लोकेश कुमार मीणा सहित कई अन्य निर्दलीय प्रत्याशियों ने चुनाव चिह्न आवंटन में गंभीर लापरवाही का आरोप लगाते हुए जिला कलेक्ट्रेट के बाहर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया और प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।
उम्मीदवारों का कहना था कि नामांकन फॉर्म दाखिल करते समय उन्होंने अपनी पसंद के 3 पसंदीदा चुनाव चिह्नों के विकल्प भरे थे, लेकिन अधिकारियों ने उनमें से एक भी सिंबल आवंटित नहीं किया। प्रत्याशियों का कहना है कि चुनाव चिह्न किसी भी उम्मीदवार की पहचान और उसके प्रचार का सबसे बड़ा जरिया होता है। ऐसे में 'चप्पल' जैसा सिंबल लेकर वार्ड के मतदाताओं के बीच जाना बेहद असहज करने वाला है और इससे उनके चुनाव प्रचार पर नकारात्मक असर पड़ेगा। हंगामे को बढ़ता देख प्रशासनिक अधिकारियों को मौके पर पुलिस बुलानी पड़ी।
दौसा नगर परिषद के 54 वार्डों में चुनाव मैदान में बचे 245 प्रत्याशियों के बीच जब सिंबल बांटे गए, तो वहां स्थिति और भी चौंकाने वाली निकली। दौसा में एक साथ 14 निर्दलीय उम्मीदवारों को 'चप्पल' चुनाव चिह्न आवंटित कर दिया गया। जैसे ही प्रत्याशियों को अपने सिंबल की जानकारी मिली, उन्होंने तुरंत इस पर आपत्ति दर्ज कराई और चुनाव आयोग से इस सिंबल को पूरी सूची से ही बाहर करने की मांग रख दी।
विरोध कर रहे उम्मीदवारों को शांत करते हुए दौसा की रिटर्निंग अधिकारी और उपखंड अधिकारी संजू मीणा ने राज्य निर्वाचन आयोग के नियमों का हवाला दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग की 40 मुक्त प्रतीकों वाली अधिकृत सूची में पहले स्थान पर 'अलमारी' और दूसरे स्थान पर 'चप्पलें' दर्ज हैं।
नियमानुसार, जब उम्मीदवारों को स्वचालित या रैंडम प्रणाली के तहत सिंबल आवंटित किए जाते हैं, तो वर्णानुक्रम के हिसाब से यह सिंबल अपने आप उम्मीदवारों के नाम के आगे आ जाता है। अधिकारियों ने साफ कर दिया कि एक बार नियम के तहत आवंटन होने के बाद इसे बदला जाना संभव नहीं है।
इस पूरे विवाद के पीछे का सबसे बड़ा मानवीय और व्यावहारिक पहलू यह है कि उम्मीदवार अपने सामाजिक मान-सम्मान को लेकर बेहद चिंतित हैं। निर्दलीय प्रत्याशियों का मानना है कि चुनाव प्रचार के दौरान विरोधी दल के कार्यकर्ता और उनके प्रतिद्वंद्वी "चप्पल मारो" या "चप्पल दिखाओ" जैसे नारों से उन पर सीधा तंज कसेंगे।
प्रत्याशियों का कहना है कि जब वे डोर-टू-डोर प्रचार के लिए हर घर के दरवाजे पर जाएंगे, तो 'चप्पल' वाले पंपलेट बांटना या इस चिह्न पर बटन दबाने की अपील करना व्यावहारिक रूप से काफी अपमानजनक महसूस होता है। इसी डर की वजह से उम्मीदवार चुनाव आयोग से मांग कर रहे हैं कि भविष्य के चुनावों में जूते, चप्पल जैसे घरेलू इस्तेमाल की ऐसी वस्तुओं को मुक्त चिह्नों की सूची से पूरी तरह हटा दिया जाना चाहिए।
केवल बूंदी और दौसा ही नहीं, बल्कि बीकानेर और जयपुर संभाग के कई अन्य नगर निकायों में भी मुक्त प्रतीकों के आवंटन के बाद का माहौल काफी दिलचस्प बना हुआ है। निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच कोट, बाल्टी, चारपाई, मिक्सी, टॉफियां, सेब और जुराबें जैसे सिंबल बांटे गए हैं, जो अब स्थानीय चौपालों पर चर्चा और चुटकुलों का विषय बने हुए हैं।
हालांकि प्रशासनिक नियमों के चलते अब निर्दलीय प्रत्याशी बिना अपनी पसंद के भी इसी 'चप्पल' सिंबल के साथ चुनावी मैदान में उतरने को मजबूर हैं। अब देखना यह होगा कि क्या ये प्रत्याशी इस विवाद को अपने पक्ष में भुनाकर जनता की सहानुभूति हासिल कर पाते हैं या फिर यह सिंबल सचमुच उनके चुनावी नतीजों पर कोई असर डालता है।
Updated on:
05 Sept 2026 01:56 pm
Published on:
05 Sept 2026 01:56 pm
