जयपुर

राजस्थान में यहां ज़िंदा शख्स की निकली अर्थी- लोग रह गए दंग ! जानें क्या है ‘अजब-गजब’ मामला?

शीतला अष्टमी पर एक ऐसी परंपरा निभाई गई जिसे देखकर बाहर से आए लोग दंग रह गए। यहां ढोल-धमाकों के बीच एक जिंदा व्यक्ति की अर्थी निकाली गई, जिसे देखने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा।

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Mar 11, 2026

राजस्थान के भीलवाड़ा शहर में बुधवार को शीतला अष्टमी के पावन अवसर पर एक ऐतिहासिक परंपरा का निर्वहन किया गया। शहर के बीचों-बीच स्थित 'चित्तौड़ वाले की हवेली' के पास से एक अर्थी निकाली गई। लेकिन चौंकाने वाली बात यह थी कि इस अर्थी पर कोई शव नहीं, बल्कि एक जीवित व्यक्ति लेटा हुआ था। इस अनोखे मंजर को देखने के लिए शहर की सड़कों पर हजारों लोगों की भीड़ जमा हो गई।

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अर्थी पर लेटा शख्स मांगता रहा पानी, पर परंपरा के आगे सब बेबस

इस परंपरा का सबसे हैरान करने वाला पहलू तब सामने आया जब अर्थी पर लेटा व्यक्ति तेज गर्मी और उमस के कारण बार-बार पानी की मांग करने लगा। वह लोगों से पीने के लिए पानी मांगता रहा, लेकिन परंपरा के अनुसार उसे किसी ने भी पानी नहीं पिलाया।

मान्यता है कि इस विशेष आयोजन के दौरान अर्थी पर लेटे व्यक्ति को 'मृतक' के समान माना जाता है और जब तक यात्रा संपन्न नहीं हो जाती, उसे पानी देना वर्जित होता है।

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चित्तौड़ वाले की हवेली से शुरू हुआ सफर

भीलवाड़ा की यह सदियों पुरानी परंपरा 'चित्तौड़ वाले की हवेली' से शुरू हुई। दोपहर जैसे ही अर्थी बाहर निकली, पूरा इलाका 'गुलाल' और 'ढोल' की आवाज से गूंज उठा। लोग अर्थी के पीछे-पीछे नाचते-गाते चल रहे थे। यह दृश्य जितना डरावना लग रहा था, स्थानीय लोगों के लिए उतना ही श्रद्धा और मनोरंजन का विषय था।

सूचना केंद्र चौराहे पर रंगों का सैलाब

शीतला अष्टमी के मौके पर भीलवाड़ा का प्रसिद्ध 'सूचना केंद्र चौराहा' रंगों के समंदर में तब्दील हो गया। होली के कई दिनों बाद भी यहां रंग खेलने का उत्साह कम नहीं हुआ। शहर के मुख्य चौराहों पर भारी मात्रा में गुलाल उड़ाया गया, जिससे आसमान सतरंगी हो गया। भीलवाड़ा की विभिन्न कॉलोनियों में युवा, महिलाएं और बुजुर्ग टोलियों में निकलकर एक-दूसरे को रंग लगाते नजर आए।

अर्थी पर ज़िंदा लेटा शख्स

आखिर क्यों निकाली जाती है 'जिंदा' अर्थी?

स्थानीय जानकारों के अनुसार, यह परंपरा किसी को डराने के लिए नहीं, बल्कि जीवन की नश्वरता को दर्शाने और खुशियों के बीच मृत्यु के सच को स्वीकार करने का एक प्रतीकात्मक तरीका है। भीलवाड़ा में शीतला अष्टमी को 'राड' या स्थानीय मेलों के रूप में मनाया जाता है, जहाँ इस तरह के स्वांग (बहुरूपिया कला) रचे जाते हैं। यह परंपरा मेवाड़ की प्राचीन बहुरूपिया कला का एक हिस्सा मानी जाती है, जो अब धीरे-धीरे लुप्त हो रही है, लेकिन भीलवाड़ा ने इसे आज भी जीवित रखा है।

सुरक्षा के रहे कड़े इंतजाम

शहर के मुख्य बाजारों और तंग गलियों से निकली इस अर्थी यात्रा के दौरान पुलिस और प्रशासन पूरी तरह सतर्क रहा। भारी भीड़ के कारण यातायात को डाइवर्ट किया गया। दोपहर की भीषण गर्मी के बावजूद लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ और शाम तक भीलवाड़ा की सड़कों पर होली का खुमार छाया रहा।

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Updated on:
11 Mar 2026 05:10 pm
Published on:
11 Mar 2026 05:09 pm
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