Stree Deh Se Aage: जवाहर कला केंद्र में ‘स्त्री: देह से आगे’ पुस्तक पर संवाद में कुलगुरु प्रो. अल्पना कटेजा व डॉ. अनुपमा राजोरिया ने कहा, विवाह संस्था में विकृति से तलाक बढ़ रहे हैं। स्त्री कमजोर नहीं, लेकिन पुरुषों से स्पर्धा कर बहुत कुछ खो रही है।
Stree Deh Se Aage: जयपुर: राजस्थान विश्वविद्यालय की कुलगुरु प्रो. अल्पना कटेजा ने समाज में तलाक के मामले बढ़ने पर चिंता जाहिर करते हुए इस स्थिति के लिए विवाह संस्था में विकृति को जिम्मेदार ठहराया। वहीं, राजकीय संस्कृत महाविद्यालय, महापुरा की प्राचार्य डॉ. अनुपमा राजोरिया ने कहा कि वेदों में अर्द्धनारीश्वर का उल्लेख है, फिर भी आज महिला स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं करती।
प्रो. कटेजा और डॉ. राजोरिया ने मंगलवार को पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी की पुस्तक ‘स्त्री: देह से आगे’ पर संवाद कार्यक्रम में यह विचार व्यक्त किए। इस संवाद का आयोजन राजस्थान पत्रिका की ओर से जवाहर कला केंद्र में नेशनल बुक फेयर के दौरान हुआ।
प्रो. कटेजा ने कहा कि स्त्री कमजोर नहीं है, बल्कि उसने स्वयं को कमजोर मान लिया है। उन्होंने सवाल किया कि स्त्री की भूमिका तय है, उसे हम जानबूझकर क्यों छोड़ते जा रहे हैं? स्त्री, पुरुष से आगे है और उससे अधिक कर सकती है। लेकिन उसने देह को कमजोरी बना लिया।
प्रो. कटेजा ने कहा कि स्त्री वह सब करना चाहती है, जो पुरुष करता है। उसे पुरुषों से स्पर्धा करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि स्पर्धा के कारण वह बहुत कुछ खो रही है। विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालने वाली यह पुस्तक युवाओं का बेहतर मार्गदर्शन करेगी।
उन्होंने विवाह नाम की संस्था कमजोर पड़ने पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि इसे हम खत्म कर रहे हैं, जबकि पश्चिमी देश इसे अपना रहे हैं। विवाह संस्था दोनों पक्षों के समर्पण के बिना संभव नहीं है।
इसमें विकृति के कारण तलाक के मामले बढ़ रहे हैं, जो अच्छा नहीं है। समाज को पुरुष प्रधान बताकर जटिलता पैदा की जा रही है। उन्होंने जीडीपी में महिलाओं के कामकाज का आकलन नहीं करने पर सवाल उठाया।
प्राचार्य डॉ. राजोरिया ने कहा कि पश्चिमी सभ्यता के पीछे जा रही पीढ़ी को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या हम स्त्री तत्व को भूलते जा रहे हैं? वेदों में अर्द्धनारीश्वर का जिक्र है, लेकिन आज महिला सुरक्षित महसूस नहीं करती। जब एक लड़की विवाह के बाद दूसरे घर जाती है तो उससे बदलने की अपेक्षा क्यों की जाती है?
हालांकि, उस घर की संस्कृति अपनाना लड़की की भी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि हम नवरात्र में नौ दिन स्त्री की पूजा तो करते हैं, लेकिन घर में उसे नमन नहीं करते। हालांकि, लड़की कभी मां, कभी बेटी और कभी सहेली बन रही है। उन्होंने कहा कि महिला की आंतरिक सुंदरता उसकी शक्ति है, जिसे देखने-समझने की जरूरत है।
सवाल: विवाह समर्पण से जुड़ा विषय है, इस संस्था में संतुलन कैसे हो सकता है?
गुलाब कोठारी: समाज को पुरुष प्रधान कहा जाता है, लेकिन यहां पुरुष शब्द को गलत समझा जाता है। पुरुष तो ईश्वर को कहा जाता है और ईश्वर कभी दो हो ही नहीं सकते। मां अपने बेटे को सिखा ही नहीं रही कि पुरुष भी आधी स्त्री है। जिसके कारण ही समाज में असंतुलन पैदा हो रहा है। मां खुद के लिए कभी नहीं जीती। मां ही है, जो बच्चे को घर में रहने लायक बना रही है, लेकिन वह बेटे को यह क्योंकि नहीं बता रही कि पुरुष भी आधी स्त्री है।
प्रो. अल्पना कटेजा: विवाह संस्था में टकराव की जगह ही नहीं है, वह तो समर्पण और प्रेम का माध्यम है। कमाई के प्रति बढ़ती सोच ने आज नजरिया बदल दिया है।
प्राचार्य डॉ. अनुपमा राजोरिया: दोनों को संतुलन बनाना होगा, तभी गाड़ी पटरी पर चल पाएगी।
सवाल: स्त्री को देवी कहा जाता है, लेकिन उसे सीमा में बांध दिया जाता है, ऐसा क्यों?
प्रो. अल्पना कटेजा: जब किसी को देवी का दर्जा दिया जाता है तो उसके बारे में कोई निश्चित दायरा नहीं होता। जो नारी की इज्जत नहीं करते, वे नवरात्र में ढोंग करते हैं। स्त्रियों के प्रति क्रूरता व अन्य अपराध बढ़ रहे हैं, यह भी मानसिकता से जुड़ा विषय है। इसे मां, बहन व पिता ही बदल सकते हैं।