सियासी गलियाराें में राजस्थान प्रदेश भाजपाध्यक्ष के लिए एक नए नाम की चर्चा है।
जयपुर। राजस्थान भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को लेकर चल रही रस्सा कसी अब तक नहीं सुलझ पार्इ है। कहा जा रहा है कि पार्टी आलाकमान और प्रदेश नेतृत्व मिलकर नाम तय करेंगे। नया अध्यक्ष कौन होगा इसका खुलासा अभी नहीं हुआ, लेकिन कहा जा रहा है कि फिलहाल अध्यक्ष का मामला टल गया है। इससे पेंडिंग कर दिया गया है। इसी बीच सियासी गलियाराें में राजस्थान प्रदेश भाजपाध्यक्ष के लिए एक नए नाम सुनील बंसल की चर्चा है।
काेटपूतली के रहने वाले हैं सुनील बंसल
राजस्थान के जयपुर जिले के काेटपूतली के रहने वाले सुनील बंसल काे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का करीब बताया जाता है। सुनील बंसल इस समय उत्तर प्रदेश बीजेपी के प्रदेश संगठन महामंत्री हैं। उन्हें यह जिम्मदारी 2017 में साैंपी गर्इ थी। सुनील बंसल 1989 में राजस्थान यूनिवर्सिटी के महासचिव रहे। इसके बाद अगले साल 1990 में उन्हें आरएसएस का प्रचारक बनाया गया। 2010 से 2014 तक बंसल ने वार्इएसी के लिए काम किया।
यूपी में किया कमाल, सभी काे आैंधे मुंह किया चित्त
सुनील बंसल राष्ट्रीय स्वयंसेवक के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय सह-संगठन मंत्री भी रह चुके हैं। बंसल ने शाह के साथ मिलकर 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए यूपी में खास रणनीति के तहत काम किया आैर भाजपा व उसकी सहयोगी पार्टियों को 80 में से 73 सीटें दिलाने में अहम फैक्टर रहे। इसके बाद यूपी विधानसभा चुनावाें में भाजपा काे मिली जीत में भी उनका अहम याेगदान रहा। यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अकेले 312 सीटें जीतकर जो इतिहास रचा, उसका श्रेय जिस समय अमित शाह और पीएम नरेंद्र मोदी को दिया जा रहा था, उसी समय सुनील बंसल लखनऊ में अपनी टीम को बधाई दे रहे थे।
ओम माथुर के साथ-साथ दिया गया था यूपी का जिम्मा
सुनील बंसल भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच बेहद लोकप्रिय माने जाते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव के चलते ही शायद पिछले आम चुनाव के पहले राजस्थान के ही वरिष्ठ नेता ओम माथुर के साथ-साथ सुनील बंसल को यूपी का जिम्मा दिया गया था। उन दिनों अमित शाह यूपी के राज्य प्रभारी बने थे और जिन लोगों को उन्होंने प्रदेश में बूथ-मैनेजमेंट की जिम्मेदारी सौंपा उनमें सुनील बंसल प्रमुख थे। खास बात यह है कि बीजेपी की सोशल मीडिया टीम पर खास नजर रखने वाले सुनील बंसल कभी सुर्खियों में नहीं रहते, बल्कि वे परदे के पीछे रहकर पार्टी की मजबूती के लिए काम करते हैं।