
जैसलमेर. मरुस्थल में पानी केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। यही सोच सुल्ताना गांव के लोगों को वर्षों से उपेक्षित पड़ी पारंपरिक 'बेरियों' के पुनर्जीवन के लिए एकजुट कर रही है। ग्रामीणों ने श्रमदान और आर्थिक सहयोग से करीब पंद्रह दिनों से अभियान चलाकर इन प्राचीन पेयजल स्रोतों को फिर से उपयोग योग्य बनाने का काम शुरू किया है। यह पहल जल संरक्षण के साथ पारंपरिक जल विरासत को बचाने का भी उदाहरण बन रही है। ग्रामीण मदनसिंह ने बताया कि सुल्ताना के दक्षिण स्थित बेरियां कभी गांव और आसपास के क्षेत्रों के लिए पेयजल का प्रमुख स्रोत थीं। वर्षा जल के संरक्षण के कारण इन स्रोतों में अकाल के दौरान भी दो से तीन वर्षों तक पानी उपलब्ध रहता था। नहर आने के बाद इनका उपयोग कम होता गया और देखरेख के अभाव में मिट्टी भरने से अधिकांश बेरियां दब गईं। अब भविष्य में पेयजल संकट की आशंका को देखते हुए ग्रामीण इन्हें फिर से जीवंत बनाने में जुटे हैं।
बेरियों की सफाई और गहरी खुदाई के लिए अनुभवी कारीगरों को बुलाया गया है। कारीगर कुओं के भीतर उतरकर मिट्टी और गंदा पानी निकाल रहे हैं। सुरक्षा की दृष्टि से ग्रामीण लगातार मौके पर मौजूद रहकर कार्य की निगरानी कर रहे हैं।
वरिष्ठ भूजल वैज्ञानिक डॉ. नारायण दास इणखिया ने मौके का निरीक्षण कर तकनीकी सुझाव दिए। उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में लगभग 20 पारंपरिक खुली बेरियां मिट्टी में दबी हुई हैं, जिन्हें पुनर्जीवित किया जा सकता है। उनका मानना है कि यह पहल सरकार के 'कर्मभूमि से मातृभूमि' अभियान की भावना को साकार करने वाला प्रेरक उदाहरण है। उन्होंने जैसलमेर से बाहर रहने वाले भामाशाहों से भी आर्थिक सहयोग की अपील की।
ग्रामीण चंदन सिंह ने बताया कि यह स्थान गांव की सांस्कृतिक और जल परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां कभी बड़ा तालाब और उसका आगोर क्षेत्र था, जो समय के साथ लुप्त हो गया। बेरियों के पुनरुद्धार से अब तालाब और उसके जलग्रहण क्षेत्र को भी पुनर्जीवित करने की उम्मीद बनी है।
वरिष्ठ भूजल वैज्ञानिक डॉ. नारायण दास इणखिया के अनुसार बेरियां जैसलमेर की पारंपरिक मीठे पानी की पेयजल संरचनाएं हैं। ये छोटे कुएं होते हैं, जिनमें वर्षा का पानी चिकनी एवं अपारगम्य मिट्टी की परतों के ऊपर कम गहराई में जमा हो जाता है। खुदाई के बाद यही संचित जल ग्रामीणों के लिए लंबे समय तक पेयजल का भरोसेमंद स्रोत बनता है।