
जैसलमेर. कभी स्वच्छ हवा और खुले आसमान के लिए पहचाना जाने वाला मरुस्थल अब बदलते पर्यावरणीय दबावों का सामना कर रहा है। जैसलमेर में बढ़ती खनन गतिविधियां, तेज निर्माण कार्य, वाहनों की संख्या में लगातार वृद्धि और शहरी विस्तार ने हवा की गुणवत्ता को नई चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है। विश्व फेफड़ा कैंसर दिवस के अवसर पर यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या मरुस्थल की बदलती हवा आने वाले वर्षों में श्वसन रोगों का बड़ा कारण बन सकती है। हालांकि जैसलमेर महानगरों जैसी गंभीर वायु प्रदूषण श्रेणी में नहीं है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि धूल के सूक्ष्म कण, डीजल वाहनों का धुआं, निर्माण स्थलों की उड़ती धूल और पत्थर खनन से निकलने वाले महीन कण धीरे-धीरे फेफड़ों पर असर डाल रहे हैं। सबसे अधिक जोखिम खदान श्रमिकों, निर्माण मजदूरों, यातायात पुलिसकर्मियों, ट्रक चालकों और खुले वातावरण में लंबे समय तक काम करने वाले लोगों पर है।
पिछले एक दशक में जैसलमेर में सड़क नेटवर्क, पर्यटन, होटल उद्योग, सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं तथा शहरी विस्तार में तेजी आई है। विकास के साथ निर्माण गतिविधियां भी बढ़ी हैं। निर्माण सामग्री की ढुलाई, भारी वाहनों की आवाजाही और खुले में उड़ती धूल स्थानीय स्तर पर वायु गुणवत्ता को प्रभावित कर रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक रेतीली धूल और मानव गतिविधियों से बनने वाले प्रदूषण में अंतर है। प्राकृतिक धूल मौसम के साथ बदलती रहती है, जबकि डीजल धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन और निर्माण से निकलने वाले सूक्ष्म कण लंबे समय तक फेफड़ों में जमा होकर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
फेफड़ों का कैंसर दुनिया में कैंसर से होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में शामिल है। वायु प्रदूषण फेफड़ों के कैंसर का महत्वपूर्ण जोखिम कारक माना जाता है। सूक्ष्म कण फेफड़ों की गहराई तक पहुंचकर कोशिकाओं को प्रभावित कर सकते हैं। धूम्रपान सबसे बड़ा कारण है, लेकिन प्रदूषित हवा, कार्यस्थल पर धूल और रसायनों का लगातार संपर्क भी जोखिम बढ़ाता है। भारत में भी श्वसन रोगों के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि छोटे शहरों और रेगिस्तानी क्षेत्रों में भी अब केवल धूम्रपान नहीं, बल्कि पर्यावरणीय जोखिमों पर समान रूप से ध्यान देना होगा।
इन्हें सबसे ज्यादा सावधानी की जरूरत?
-खदान और पत्थर उद्योग से जुड़े श्रमिक
-निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मजदूर
-ट्रक, बस और टैक्सी चालक
-यातायात पुलिसकर्मी
-बुजुर्ग और पहले से अस्थमा या सीओपीडी के मरीज।
-लगातार धूल वाले वातावरण में काम करने वाले किसान और मजदूर
फेफड़ों का कैंसर केवल धूम्रपान करने वालों तक सीमित नहीं रहा। लंबे समय तक धूल, डीजल धुएं और प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने वाले लोगों में भी जोखिम बढ़ सकता है। लगातार खांसी, सांस फूलना, खून वाली खांसी, सीने में दर्द या आवाज में बदलाव जैसे लक्षण दिखाई दें तो जांच में देरी नहीं करनी चाहिए। निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण, हरित पट्टियां, नियमित जल छिड़काव और स्वच्छ ईंधन का उपयोग प्रभावी कदम साबित हो सकते हैं।
- डॉ. आरके पालीवाल, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, जैसलमेर
क्या किया जा सकता है?
-निर्माण स्थलों पर नियमित पानी का छिड़काव।
-खनन क्षेत्रों में धूल नियंत्रण तकनीक लागू करना।
-सार्वजनिक परिवहन और स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा।
-जोखिम वाले श्रमिकों के लिए एन-95 मास्क और नियमित स्वास्थ्य जांच।
- लगातार खांसी या सांस संबंधी परेशानी होने पर तुरंत विशेषज्ञ से परामर्श।
-अधिक पौधरोपण और हरित क्षेत्र विकसित करना