जैसलमेर

जिले में इस तरह बिगड़ सकता है चुनावी समीकरण,साल 2008 के चुनाव में भी हुआ था ऐसा,जानिए पूरी खबर

जैसलमेर में चुनावी घमासान...असंतुष्टों का ‘भितरघात’ बिगाड़ सकता है गणित! -विपक्षी पार्टियों को घेरने की रणनीति बना चुकी दोनों पार्टियों को भितरघात की आशंका -शीर्ष पंक्ति के नेताओं व समर्थकों की दूरियां बयां कर रही अलग कहानी
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Nov 22, 2018
bjp congress
जिले में इस तरह बिगड़ सकता है चुनावी समीकरण,साल 2008 के चुनाव में भी हुआ था ऐसा,जानिए पूरी खबर

जैसलमेर. सरहदी जैसलमेर जिले में चुनावी रणभेरी बजने के बाद दोनों पार्टियों में अपने प्रत्याशियों के नामों की घोषणा व नामांकन के दौरान जहां कई चेहरों पर खुशी है, वहीं ऐसे भी कई लोग है जो खफा है। दोनों पार्टियों में असंतुष्टों की बढ़ रही फेहरिस्त के बीच दोनों पार्टियों को चुनावी प्रचार में उत्साह फूंकने व चुनाव प्रचार को परवान पर चढ़ाने में पसीना आ रहा है। चुनाव प्रचार अभियान के दौरान विपक्षी पार्टियों को घेरने की रणनीति बना चुकी दोनों पार्टियों को भितरघात की आशंका भी सता रही है। हालांकि बयान यह दिए जा रहे हैं कि रुठों को मना लिया जाएगा, लेकिन हकीकत कुछ और ही नजर आ रही है।
नामांकन वापिस लेने की कवायद शुरू हो चुकी है, ऐसे में कुछ ही दिन में यह स्थिति स्पष्ट हो जाएगी कि सियासत के लिए चल रहे चुनावी दंगल में कितने दावेदार चुनाव मैदान में है। उधर, गुटबाजी व असंतोष के माहौल में किसी तरह असंतुष्ठ नेताओं को मना लेने के प्रयास सफल होने के बाद एकाएक सकारात्मक परिस्थितियां बन जाएगी, इसको लेकर खुद कांग्रेस व भाजपा, दोनों पार्टियां ही सहज रुप से विश्वास नहीं कर पा रही है। चुनावी प्रचार में ताकत झोंकने से पहले प्रयास यही किया जा रहा है कि पार्टी-संगठन की ताकत को बिखरने नहीं दिया जाए और उसके बाद सही दिशा में सुनियोजित तरीके से प्रचार-प्रसार किया जाए। हकीकत यह है कि असंतुष्ट नेताओं की सार्वजनिक बयानबाजी के साथ कई शीर्ष पंक्ति नेताओं व उनके समर्थकों की दूरियां मौजूदा स्थिति की कहानी खुद बयां कर रही है।
जब पनपा असंतोष तो हुई ‘बगावत’
जैसलमेर विधानसभा क्षेत्र में इस बार दोनों राजनीतिक दलों से कोई बागी चुनाव मैदान में नहीं हैं, लेकिन पार्टी से बगावत कर बागी खड़े होने की परंपरा कोई नई नहीं है। जब-जब टिकट को लेकर असंतोष उपजा तब-तब संबंधित दलों के बागियों ने चुनाव मैदान में उतरकर विरोध के स्वर मुखर किए हैं या फिर भितरघात कर चुनावी गणित को भी बदल दिया गया है। कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस को बगावत के तेवर झेलने पड़े हंै। वर्ष 1990 के विधानसभा चुनावों में भाजपा व जनता दल के गठबंधन के बीच जनता दल के प्रत्याशी डॉ. जितेन्द्रसिंह का विरोध कर जुगतसिंह चुनाव मैदान में उतरे। बागी प्रत्याशियों के चुनावी समर में उतरने का सिलसिला यहीं नहीं थमा। वर्ष 1993 में कांग्रेस ने डॉ. जितेन्द्रसिंह को प्रत्याशी बनाया। उस दौरान फतेह मोहम्मद ने डॉ. सिंह की उम्मीदवारी का विरोध करते हुए चुनावी मैदान में निर्दलीय चुनाव लड़ा। इसके बाद वर्ष 1998 के चुनाव में भी बागी प्रत्याशी ने चुनाव लड़ा और इस बार यह स्थिति झेलनी पड़ी भाजपा को। इस चुनाव में सांगसिंह भाटी ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और दूसरे स्थान पर रहे। इसके अगले चुनाव 2003 में कांग्रेस की ओर से उतारे गए प्रत्याशी जनकसिंह भाटी की उम्मीदवारी से नाराज होकर डॉ. रामजीराम ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा। वर्ष 2008 का विधानसभा चुनाव एक तरह से बागियों के नाम ही रहा। इस चुनाव में दोनों ही पार्टियों कांग्रेस व भाजपा के बागी प्रत्याशियों ने टिकट वितरण से नाराज होकर निर्दलीय चुनाव लड़ा। कांग्रेस से गोवद्र्धन कल्ला व भाजपा से किशनसिंह भाटी ने बागी बनकर निर्दलीय चुनाव लड़ा।
एक बार विजयी
वर्ष 198 5 के विधानसभा चुनाव में मुल्तानाराम बारुपाल को निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर विजय हासिल हुई। इनके वर्ष 1990 से लेकर 2008 तक किसी भी बागी प्रत्याशी को जीत हासिल नहीं हो पाई है। वैसे अब तक जैसलमेर विधानसभा 1४ विधानसभा चुनावों में जैसलमेर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में अब तक छह बार भाजपा, तीन बार कांग्रेस, एक बार जनता दल, तीन बार निर्दलीय व एक बार स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार ने चुनाव में विजय हासिल की।

वर्ष बागी व पार्टी परिणाम
1990 जुगतसिंह / भाजपा हारे 1993 फतेह मोहम्मद / कांग्रेस हारे
1998 सांगसिंह भाटी/ भाजपा हारे
2003 डॉ. रामजीराम/ कांग्रेस हारे
2008 गोवद्र्धन कल्ला/ कांग्रेस हारे
2008 किशनसिंह भाटी/ भाजपा हारे

Published on:
22 Nov 2018 05:41 pm