भीषण गर्मी के दौरान प्रशासन की ओर से एडवाइजरी जारी की जाती है और अस्पतालों को सतर्क रहने के निर्देश दिए जाते हैं। जिला अस्पताल व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में हीट स्ट्रोक से प्रभावित मरीजों के उपचार की व्यवस्था भी की जाती है। इसके बावजूद शहर में सार्वजनिक कूलिंग पॉइंट या ऐसे राहत केंद्रों की संख्या नगण्य है, जहां राहगीर, मजदूर और जरूरतमंद लोग अत्यधिक गर्मी से राहत पा सकें।

मरुस्थलीय क्षेत्र होने के कारण जैसलमेर सदियों से गर्म जलवायु का सामना करता आया है, लेकिन हाल के वर्षों में बढ़ती गर्मी, बार-बार पडऩे वाली लू, जल संकट और बदलते मौसम के स्वरूप ने चुनौतियों को और गंभीर बना दिया है। इस वर्ष मई माह में ही तापमान 46 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया।
ऐसे में सवाल यह है कि क्या जैसलमेर जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न खतरों का सामना करने के लिए तैयार है या अभी भी अधिकांश तैयारियां कागजों तक ही सीमित हैं? जानकारों के अनुसार किसी भी शहर को क्लाइमेट रेडी बनाने के लिए हीट एक्शन प्लान, जल संरक्षण, सार्वजनिक राहत केंद्र, हरित क्षेत्र, आपदा प्रबंधन और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी व्यवस्थाओं का मजबूत होना जरूरी है। जैसलमेर में इन क्षेत्रों में कुछ प्रयास जरूर हुए हैं, लेकिन कई मोर्चों पर अभी भी सुधार की पर्याप्त गुंजाइश बनी हुई है।
भीषण गर्मी के दौरान प्रशासन की ओर से एडवाइजरी जारी की जाती है और अस्पतालों को सतर्क रहने के निर्देश दिए जाते हैं। जिला अस्पताल व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में हीट स्ट्रोक से प्रभावित मरीजों के उपचार की व्यवस्था भी की जाती है। इसके बावजूद शहर में सार्वजनिक कूलिंग पॉइंट या ऐसे राहत केंद्रों की संख्या नगण्य है, जहां राहगीर, मजदूर और जरूरतमंद लोग अत्यधिक गर्मी से राहत पा सकें। विशेषज्ञ मानते हैं कि बढ़ती गर्मी को देखते हुए बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, प्रमुख बाजारों और सार्वजनिक स्थलों पर अस्थायी कूलिंग सेंटर विकसित किए जाने चाहिए। साथ ही निर्माण श्रमिकों, ट्रैफिक पुलिस कर्मियों और डिलीवरी कर्मचारियों के लिए विशेष सुरक्षा दिशा-निर्देशों का प्रभावी पालन भी जरूरी है।
जैसलमेर की सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौती पानी है। इंदिरा गांधी नहर लिफ्ट परियोजना के बावजूद जिले के कई क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति को लेकर परेशानी बनी रहती है। वर्षा जल संग्रहण की परंपरागत प्रणालियों को पुनर्जीवित करने के प्रयास हुए हैं, लेकिन शहरी क्षेत्रों में रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग का दायरा अभी सीमित है। राजस्थान पत्रिका की ओर से प्रतिवर्ष चलाए जाने वाले अमृतं जलमï् अभियान के तहत पारम्परिक जलस्रोतों के संरक्षण से अवश्य तस्वीर में कुछ बदलाव आया है। हाल में राज्य सरकार के निर्देशानुसार वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान का संचालन जिले भर में किया जा रहा है। इसके परिणाम आगामी मानसून के दौरान सामने आएंगे। जलवायु परिवर्तन के दौर में हर नए भवन में वर्षा जल संग्रहण को प्रभावी ढंग से लागू करना होगा। साथ ही पुराने तालाबों, सरोवरों और जल संरचनाओं के संरक्षण पर भी विशेष ध्यान देना होगा ताकि भविष्य के जल संकट को कम किया जा सके।
क्लाइमेट रेडी सिटी के प्रमुख मानकों में शहरी हरियाली और बेहतर वेस्ट मैनेजमेंट भी शामिल हैं। जैसलमेर में पौधरोपण अभियान नियमित रूप से चलाए जाते हैं, लेकिन रेगिस्तानी परिस्थितियों और पानी की कमी के कारण पौधों का संरक्षण बड़ी चुनौती बना रहता है। वहीं नगरपरिषद की ओर से ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को और अधिक वैज्ञानिक तथा प्रभावी बनाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। पर्यावरण के जानकारों का कहना है कि यदि कचरा प्रबंधन, जल संरक्षण और हरित क्षेत्र विस्तार को प्राथमिकता दी जाए तो शहर की जलवायु सहनशीलता काफी बढ़ सकती है।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि बढ़ती जलवायु चुनौतियों के बीच जैसलमेर को केवल मरुस्थलीय शहर नहीं, बल्कि भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार शहर बनाने की दिशा में कितनी तेजी से काम किया जा रहा है। यदि अभी से समन्वित प्रयास नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में गर्मी, जल संकट और पर्यावरणीय दबाव और अधिक गंभीर रूप ले सकते हैं।
- डॉ. गौरव बिस्सा, एसोसिएट प्रोफेसर