
पश्चिमी राजस्थान में ऊर्जा क्रांति का चेहरा अब साफ दिखाई देने लगा है। विशाल पवन चक्कियां, लंबी टावर संरचनाएं और खुले रेगिस्तानी मैदान—यह सब मिलकर एक नई ग्रामीण अर्थव्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं, लेकिन इसके साथ चुनौतियां भी उतनी ही तेजी से उभर रही हैं। राज्य में वर्तमान में लगभग 4913 मेगावाट पवन ऊर्जा उत्पादन हो रहा है, जिसमें अकेले जैसलमेर और बाड़मेर क्षेत्र का योगदान 4000 मेगावाट से अधिक है। इस तरह ऊर्जा उत्पादन का केंद्र अब शहर नहीं, बल्कि ग्रामीण और सीमावर्ती क्षेत्र बन चुके हैं। जैसलमेर शहर के समीप अमरसागर और बड़ा बाग क्षेत्र में स्थापित 43 पवन ऊर्जा टरबाइन इस बदलाव की वास्तविक तस्वीर दिखाते हैं। रेत पर खड़े संयंत्र न केवल बिजली नहीं बना रहे, बल्कि गांवों की सामाजिक और आर्थिक संरचना भी बदल रहे हैं।
- एक पवन ऊर्जा संयंत्र की लागत लगभग 15–16 करोड़ रुपए
- औसत उत्पादन क्षमता 3.4 मेगावाट
-करीब 1900 घरों तक बिजली आपूर्ति की क्षमता
- हवा की गति 15 किमीप्रति घंटा को आदर्श स्थिति माना जाता है
- ऊर्जा परियोजनाओं ने रोजगार के अवसर तो बढ़ाए हैं, लेकिन उनका स्वरूप सीमित है।
-निर्माण चरण में अस्थायी रोजगार
- तकनीकी संचालन में बाहरी विशेषज्ञों की निर्भरता
- ग्रामीण युवाओं के लिए कौशल अंतर
- पंचायत राजस्व में सीमित हिस्सा
बाड़मेर और आसपास के क्षेत्रों में सौर और पवन ऊर्जा के साथ कृषि आधारित मॉडल भी बदल रहा है।
- कुछ क्षेत्रों में सौर ऊर्जा से कृषि पंप संचालित
- नहर और जल परियोजनाओं के साथ मिश्रित उपयोग
- भूमि उपयोग का दोहरा मॉडल विकसित हो रहा
- ऊर्जा और खेती का सह-अस्तित्व बढ़ रहा
- कुशल श्रमिकों की कमी
-ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित तकनीकी प्रशिक्षण
-पानी की उपलब्धता
-स्थानीय हिस्सेदारी का मुद्दा
ऊर्जा और ग्रामीण विकास विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थानीय युवाओं को तकनीकी प्रशिक्षण और परियोजनाओं में अधिक भागीदारी दी जाए, तो यह मॉडल केवल ऊर्जा उत्पादन नहीं बल्कि ग्रामीण समृद्धि का मजबूत आधार बन सकता है।
- जितेंद्र थानवी, ऊर्जा विशेषज्ञ