राजस्थान के जैसलमेर जिले में 46°C तापमान ने पर्यटन पर ब्रेक लगा दिया है। धोरों की रेत तपकर लाल हो रही है, जिससे सैलानी गायब हैं। होटल-रिसॉर्ट खाली और किराए आधे हो गए। 9 महीने में 1800 करोड़ का कारोबार करने वाला सेक्टर इन 3 महीनों में सुस्त है।
जैसलमेर: रेगिस्तान की तपिश ने पर्यटन की रफ्तार को थाम दिया है। तापमान 46 डिग्री पार पहुंचते ही जैसलमेर का पर्यटन लू की चपेट में आ गया। सुबह सात से शाम सात बजे तक बाहर निकलना कठिन हो गया है।
लू के थपेड़े आग की लपटों जैसे महसूस हो रहे हैं और धोरों की रेत अंगारों की तरह तपने लगी है। पर्यटकों को आकर्षित करने वाले धोरों का नजारा अब झुलसाने वाला बन चुका है। पीले पत्थरों की हवेलियां तेज धूप में तपकर लालिमा लिए नजर आ रही हैं। ऐसे हालात में ठहराव लगभग थम गया है और शहर का पर्यटन सन्नाटे में बदल गया है।
पर्यटन कारोबार पर इसका सीधा असर दिख रहा है। स्थानीय लोग भी गर्मी से राहत पाने के लिए पहाड़ी क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं। शिमला, लेह-लद्दाख, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, माउंट आबू और उदयपुर जैसे स्थानों पर जाने वालों की संख्या बढ़ रही है।
भीषण गर्मी ने साफ कर दिया कि जैसलमेर का पर्यटन पूरी तरह मौसम पर निर्भर है। तापमान बढ़ते ही चमकता उद्योग ठहराव में बदल जाता है और पूरी अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।
वरिष्ठ पर्यटन व्यवसायी सुमेर सिंह राजपुरोहित के अनुसार, जैसलमेर में मौसमी निर्भरता सबसे बड़ी चुनौती है। गर्मियों में गतिविधियां ठप हो जाना आर्थिक असंतुलन पैदा करता है। नाइट टूरिज्म, डेजर्ट सफारी के शाम और रात वाले मॉडल, इनडोर हेरिटेज अनुभव, संग्रहालय आधारित गतिविधियां और सांस्कृतिक आयोजनों को बढ़ावा देना जरूरी है।
एयर कनेक्टिविटी को सालभर बनाए रखने की रणनीति भी अहम है। यदि सीमित ही सही, लेकिन निरंतर पर्यटक आवागमन बना रहे, तो रोजगार और कारोबार को स्थिरता मिल सकती है। योजनाबद्ध नवाचार और निवेश से ही गर्मी के संकट को अवसर में बदला जा सकता है।