
जैसलमेर. जैसलमेरी पत्थर उद्योग की सबसे बड़ी चुनौती केवल बाजार या मांग की नहीं है। इसकी जड़ें खनन व्यवस्था से भी जुड़ी हैं। जिले में मिलने वाला पीला पत्थर जमीन की सतह के आसपास ही उपलब्ध होता है और इसकी खदानें अन्य बड़े खनिज क्षेत्रों की तुलना में अलग प्रकृति की हैं। इसके बावजूद लागू नियम और प्रक्रियाएं कई बार स्थानीय परिस्थितियों से मेल नहीं खातीं। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि जैसलमेर के पत्थर के लिए ऐसी खनन नीति की जरूरत है जो यहां के भौगोलिक स्वरूप और छोटे कारोबारियों की क्षमता को ध्यान में रखे।पहले कई क्षेत्रों में खनन पट्टों का आवंटन अपेक्षाकृत सरल प्रक्रिया से होता था। बाद में नीलामी आधारित व्यवस्था लागू होने के बाद छोटे उद्यमियों के लिए प्रवेश कठिन हो गया।
- शुरुआती निवेश में बढ़ोतरी।
- छोटे कारोबारियों की सीमित आर्थिक क्षमता।
- खदान संचालन की जटिल प्रक्रिया
- स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप नीति का अभाव
जैसलमेरी पत्थर की प्रकृति को देखते हुए उद्योग जगत छोटे क्षेत्रफल वाली खदानों के आवंटन की मांग कर रहा है। उनका तर्क है कि यहां बड़े पैमाने पर गहरे खनन की संभावना नहीं है, इसलिए छोटे पट्टे स्थानीय युवाओं और छोटे उद्यमियों के लिए अधिक उपयोगी हो सकते हैं। इससे न केवल रोजगार बढ़ सकता है, बल्कि बंद पड़ी संभावनाओं को भी दोबारा गति मिल सकती है।
पत्थर उद्योग में खनन मजदूरों से लेकर कटिंग, डिजाइनिंग, परिवहन और बिक्री तक कई स्तरों पर रोजगार जुड़ा है। इसलिए नीतिगत सुधार केवल व्यापार का विषय नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा मुद्दा भी है। यदि उद्योग की रफ्तार कमजोर होती है तो इसका असर सीधे उन परिवारों पर पड़ता है जिनकी आय इसी क्षेत्र पर निर्भर है।
जैसलमेरी पत्थर की खदानों के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार नीति बनानी होगी। छोटे क्षेत्रफल की खदानों से स्थानीय उद्यमियों को अवसर मिलेगा और उद्योग का आधार मजबूत होगा।
-संजय बिंझानी, पत्थर व्यवसाय विशेषज्ञ