
Sufi Folk Singer Sawan Khan Dabri: जैसलमेर की माटी के लाल और सूफी गायन को अपने मजबूत कंठ के सहारे दुनिया भर के मंचों तक पहुंचाने वाले सावन खां दबड़ी की मृत्यु ने लोकगीत-संगीत की महफिल में एक बड़ा शून्य पैदा कर दिया है। वे कोक स्टूडियो से जुड़ने वाले पहले लोक कलाकार थे और उन्होंने करीब 50 देशों में आयोजित कार्यक्रमों में भागीदारी कर मरु गीत-संगीत की मिठास का परचम फहराया था।
गौरतलब है कि सावन खां पिछले दो वर्षों से लीवर की असाध्य बीमारी से जूझ रहे थे। गत सोमवार को जैसलमेर में उनका निधन हुआ और पैतृक गांव में गमगीन माहौल में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया। कोक स्टूडियो के लिए गाए गए उनके गीत साथी सलाम ने उन्हें वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई।
इसके साथ ही हिंदी फिल्म 'हाईवे' में उन्होंने तकदीर तख्त चढ़ायो गीत गाकर लोकप्रियता अर्जित की। सावन खां के पिता रोजे खां स्वयं एक गायक कलाकार थे और उनकी छाया में बचपन से ही सावन खां ने सुर-साधना शुरू कर दी।
वे अपने पीछे तीन बेटों और एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को छोड़ गए। सावन खां उन चुनिंदा कलाकारों में थे, जिन्होंने सिंधी कलाम और राजस्थानी लोक संगीत को नई ऊंचाई दी।
सावन खां ने सिंधी कलाम और मारवाड़ी लोकगीतों का जादू बिखेरा। उनकी सिंधी भजन और सूफियाना कलाम पर जबरदस्त पकड़ थी। विशेषकर उनके गायन का सूफियाना अंदाज हर किसी के सिर चढ़ कर बोलता था।
उनके गाए लोकप्रिय गीतों में उमर माडू, मिठो कांगलो और रांगार चैन है। नई पीढ़ी के संगीत रसिकों ने इन गीतों को यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भरपूर ढंग से सुना व सराहा है।
सलीम खां
सावन खां के देहावसान से लोक कलाकारों के साथ मरु संगीत के कद्रदानों को गहरा धक्का लगा है। उनके निधन से लोक संगीत ने एक नायाब रतन हमेशा के लिए खो दिया है। उनके साथ लोक संगीत के एक युग का अंत हो गया है।
वे अपने सादा अंदाज में सूफी गायकी को परवान चढ़ाने के लिए हमेशा याद किए जाएंगे। उनके निधन से मरु लोक कला जगत में कभी न भरने वाली रिक्तता उत्पन्न हो गई है।
-सलीम खां, अध्यक्ष, मिरासी समाज जैसलमेर