आज पूरे देश में जाति के आधार पर राजनीति चल रही है। किसी न किसी बहाने एक विशेष वर्ग का समर्थन पाने के लिए राजनीतिक पार्टियां हर दांव पेंच आजमा रही हैं।
डॉ. संदीप उपाध्याय/जांजगीर-चांपा. आज पूरे देश में जाति के आधार पर राजनीति चल रही है। किसी न किसी बहाने एक विशेष वर्ग का समर्थन पाने के लिए राजनीतिक पार्टियां हर दांव पेंच आजमा रही हैं। इन सबके बीच जांजगीर-चांपा जिला इस सोच से ऊपर है। यहां चुनाव जाति व वर्ग भेद के आधार पर जीतना नामुमकिन है। यहां के पिछले इतिहास की बात की जाए, तो जांजगीर विधानसभा सीट में मात्र एक घर का सरदार हजारों घरों से जुड़े उम्मीदवार को पटखनी दे चुका है।
चांपा में 1990 में बलिहार सिंह मात्र एक घर के सरदार थे, लेकिन उनकी समाजसेवी सोच व सक्रियता को देखते हुए बीजेपी ने उन्हें अपना विधानसभा उम्मीदवार घोषित किया और बिना किसी जाति या वर्ग की बाहुल्यता के बाद भी उन्होंने अच्छे मतों से जीत दर्ज की थी। इसी उपलब्धि के चलते उन्हें जेल मंत्री भी बनाया गया था।
इसी तरह साल 2000 में नगर पालिका चांपा के चुनाव में अनुपम श्रीवास्तव बीजेपी से अध्यक्ष पद के लिए खड़े हुए। उस समय उनके पास उनकी जाति के मात्र तीन मत थे। इसमें उनकी मां और पत्नी का वोट भी शामिल किया। श्रीवास्तव की अच्छी सोच को जनता ने स्वीकारा और वो विजयी हुए। इसी तरह शुकंतला सिंह और प्रदीप नामदेव ने अपने काम की वजह से जीत हासिल की।
आरक्षित के बजाए अनारक्षित सीट पर बसपा की जीत
जिले की छह विधानसभा सीटों की बात की जाए तो यहां बसपा आरक्षित सीट की जगह अनारक्षित सीट पर अपनी जीत दर्ज कर रही है। पामगढ़ विधानसभा की सीट एससी वर्ग के लिए आरक्षित हैं, लेकिन बसपा यहां के बजाए अकलतरा विधानसभा में जीत दर्ज कर चुकी है और जैजैपुर वर्तमान में उसके पास ही है। यह दोनों ही सीट अनारक्षित हैं। इससे साफ है कि जिले के मतदाता इतने जागरूक हैं कि वह किसी जाति विशेष पर नहीं बल्कि उम्मीदवार की छवि को देखकर मतदान करते हैं।