जांजगीर चंपा

#Topic Of The Day : बच्चे को उसके मुताबिक खेलने और सीखने दें : वानी

वानी का कहना है कि बच्चे को बचपन से स्कूल भेजना सही है, लेकिन पालकों का बच्चे के ऊपर अपनी अपेक्षाओं को डालना गलत है।

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टॉपिक ऑफ द डे
जांजगीर-चांपा. पत्रिका डॉट कॉम द्वारा आयोजित टॉपिक ऑफ द डे कार्यक्रम में रविवार को पत्रिका कार्यालय में पामगढ़ क्षेत्र अंतर्गत शासकीय प्राथमिक शाला बारगांव में पदस्थ सहायक शिक्षक पंचायत सतीश कुमार वानी मेहमान के रूप में पहुंचे। उन्होंने पत्रिका से बातचीत के दौरान बहुत अहम जानकारी देते हुए बताया कि बच्चा अपनी मर्जी से सीखता है और उस पर किसी तरह का दबाव न बनाएं और बच्चे की समझ के मुताबिक ही ढलकर उसे शिक्षा दें।

सतीश कुमार वानी ने बताया कि बच्चा एक मिट्टी का लोंदा की तरह होता है। उसे तराशने का कार्य उसके परिवार और मुख्य रूप से माता-पिता करते हैं। माता-पिता ही बच्चे को चलना, बोलना और अन्य कई तरह का ज्ञान देते हैं। उसके बाद बच्चा जब स्कूल की दहलीज पर कदम रखता है तो यह जिम्मेदारी शिक्षक की हो जाती है। यहां से शुरू होती है शिक्षक की अग्नि परीक्षा।

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शिक्षक अपने अनुभव व टेकनिक से बच्चे को अक्षर व शब्द ज्ञान सिखाता है, लेकिन वह बच्चे के मस्तिस्क में कितना बैठ रहा है यह बात बहुत अहम है। यदि बच्चा अ, ई या क से ग तक एक-एक अक्षर को पहचान लेता है या समूह में लिखे अक्षर को पूछने पर बता देता है तो शिक्षक की मेहनत सार्थक है। यदि बच्चा नहीं बता पाता तो शिक्षक को यह आत्म मंथन करना चाहिए कि वह कहां चूक रहा है।

सतीश वानी की मानें तो शिक्षक यदि बच्चे को उसकी समझ और सीख के मुताबिक पढ़ाएं तो यह रास्ता काफी आसान हो जाएगा और बच्चा जल्द सीखने लगेगा। इसके आगे उन्होंने बताया कि शासकीय और निजी विद्यालय के पैटर्न को लेकर। आजकल प्रारंभिक शिक्षा में प्ले से लेकर यूकेजी तक चार साल पढ़ाने का ट्रेंड चला है, वहीं शासकीय स्कूल में आंगनबाड़ी व उसके बाद कक्षा एक से पढ़ाई शुरू होती है।

इस पैटर्न को वानी सही मानते हैं और उनका कहना है कि बच्चे को छोटे-छोटे भाग में पढ़ाई करने पर उसके ऊपर अधिक बोझ नहीं पड़ता और वह शिक्षा के साथ-साथ अपना बचपन भी जी पाता है। वानी का कहना है कि बच्चे को बचपन से स्कूल भेजना सही है, लेकिन पालकों का बच्चे के ऊपर अपनी अपेक्षाओं को डालना गलत है।

आरटीई जमीनी हकीकत से दूर
सहायक शिक्षक पंचायत वानी की मानें तो शासन की कई योजनाओं में से आरटीई यानि शिक्षा का अधिकार अधिनियम भी काफी अहम है, लेकिन जरूरत यह देखने की है कि वह कितना कारगर है और गरीब बच्चों को उसका सही लाभ मिल पा रहा है या नहीं। उनका कहना है कि इसके लिए एक विशेष टीम होनी चाहिए, जो समय-समय पर क्षेत्र का सर्वे करने के साथ ही स्कूल में जाकर इसकी जांच करें।

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Published on:
01 Apr 2018 03:15 pm
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