किसानों की हितैषी सरकार होने का दावा करने वाली भाजपा सरकार
जांजगीर-चांपा. किसानों की हितैषी सरकार होने का दावा करने वाली भाजपा सरकार की छत्र छाया में किसान कहां तक फल-फूल रहे हैं, इसकी बानगी देखनी है, तो प्रदेश ही नहीं देश में कृषि के क्षेत्र में अलग पहचान बना चुके कृषि प्रधान जिले जांजगीर में देखी जा सकती है।
यहां किसानों की दो करोड़ रुपए से अधिक की राशि बीज निगम ने भुगतान करने से मना कर दिया है। इसके पीछे मंडी बोर्ड से किसानों को मिलने वाली सब्सिडी नहीं मिलने की बात कह कर बीज निगम के अफसर अपना पल्ला झाड़ रहे हैं।
देश में सर्वाधिक धान उत्पादक जिले का खिताब रखने वाले जांजगीर जिले के किसान इन दिनों बीज निगम से परेशान हैं। निगम द्वारा बीज के लिए धान देने वाले किसानों का करीब 2 करोड़ रुपए का भुगतान नहीं किया गया है।
इस संबंध में जिले के किसान संगठन कृषक चेतना मंच ने नाराजगी जताते हुए कलेक्टर सहित मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के समक्ष किसानों के साथ छल न करने की मांग की है। मंच के पदाधिकारियों ने मुख्यमंत्री से कहा है कि बीज उत्पादन के नाम पर सरकार किसानों के साथ अनुबंध करती है और उसी आधार पर खरीदी करती है, लेकिन गत वर्ष अनुबंध के बाद भी किसानों को 200 रुपए प्रति क्विंटल राशि काट कर भुगतान किया गया है।
उन्होने यह भी बताया कि जिले में बीज उत्पादक 481 किसान पंजीकृत हैं, जिनसे हर साल करीब 55 हजार क्विंटल धान खरीदा जाता है। इन किसानों को बीज के एवज में समर्थन मूल्य से 500 रुपए अधिक प्रोत्साहन राशि प्रदान किया जाता है। इसमें 300 रुपए बीज निगम तथा 200 रुपए मंडी बोर्ड की ओर से दिया जाता है, लेकिन बीज निगम राशि प्रदान नहीं कर रहा है। उनके द्वारा मंडी बोर्ड से सब्सिडी नहीं मिलने की बात कही जा रही है। पदाधिकारियों ने चेतावनी दी है कि जल्द ही पूरी राशि का भुगतान नहीं किया गया, तो वह आंदोलन के लिए बाध्य करने होंगे।
बीज उत्पादन में अधिक लागत
मंच के संयोजक ठा. राजशेखर सिंह, संदीप तिवारी ने बताया कि धान बीज का उत्पादन करने में लागत अधिक आती है। साथ ही किसानों को मेहनत भी अतिक्ति करनी पड़ती है। किसान भुवनलाल, नानकचंद, जितेंद्र पटेल, शंकरलाल चंद्रा, रामकुमार कश्यप, शोभाराम पटेल, धरमलाल सूर्य ने बताया कि बीज उत्पादन करने के लिए खेत को तैयार करने में ही पैसे व मेहनत खर्च हो जाते हैं, फिर रोपाई भी विशेष तौर पर करनी पड़ती है।
इसी तरह निंदाई, गुड़ाई के साथ मिसाई में भी अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है। पूरी प्रक्रिया के बाद जो राशि शासन से मिल रही है, वह कम है, फिर भी शासन की ओर से सब्सिडी बंद करना समझ से परे है।
नहर मरम्मत के नाम पर छलावा
कृषक चेतना मंच के सदस्यों ने नहर मरम्मत के नाम पर गरमी की फसल के लिए पानी नहीं देना किसानों के साथ सरकार का छल बताया। किसानों का मानना है कि जब निजी पावर कंपनियों की आवश्यकतानुसार नहर में पानी छोड़ा जाता है, तब किसानों को पानी देने क्या परेशानी है। इस पर सरकार नहर मरम्मत का हवाला देती है,
लेकिन यहां भी छल किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि विगत पांच वर्षों के दौरान जिले में नहर मरम्मत के नाम पर एक हजार करोड़ से अधिक राशि खर्च की गई है, लेकिन जिले के सभी नहर अब भी बदहाल हैं। उन्होंने यह भी बताया कि किसानों को पानी देने के साथ भी नहर की मरम्मत की जा सकती है, लेकिन शासन ऐसा नहीं चाहती, इसलिए किसान छले जा रहे हैं।