झालावाड़

पिपलोदी हादसे का एक साल: भरभरा कर गिरे जर्जर स्कूल में दब गए थे मासूम बच्चे, ये जख्म सताएगा; उम्मीद है फिर हरा न हो

Piplodi School Accident One Year: 25 जुलाई अब सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह वह दिन है, जिसने झालावाड़ जिले के पिपलोदी गांव के सात परिवारों से उनके भविष्य छीन लिए और पूरे गांव की स्मृतियों पर ऐसा घाव छोड़ दिया, जो एक साल बाद भी नहीं भर पाया है।
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Piplodi School Accident One Year
पिपलोदी हादसे का एक साल। फोटो: पत्रिका

झालावाड़। 25 जुलाई अब सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह वह दिन है, जिसने झालावाड़ जिले के पिपलोदी गांव के सात परिवारों से उनके भविष्य छीन लिए और पूरे गांव की स्मृतियों पर ऐसा घाव छोड़ दिया, जो एक साल बाद भी नहीं भर पाया है। समय आगे बढ़ गया, स्कूल में फिर से पढ़ाई शुरू हो गई, बच्चों की नई पीढ़ी कक्षाओं में बैठने लगी, लेकिन उस हादसे की टीस आज भी गांव के हर घर में महसूस की जाती है।

ठीक एक वर्ष पहले आज ही के दिन बच्चे रोज की तरह बस्ता लेकर स्कूल पहुंचे थे। किसी ने मां से जल्दी लौटने का वादा किया था, कोई दोस्तों के साथ खेलने की बातें कर रहा था, तो किसी के मन में पढ़-लिखकर कुछ बनने का सपना था। किसी को यह आभास तक नहीं था कि कुछ ही मिनटों बाद वे सभी सपने जर्जर छत के मलबे में हमेशा के लिए दफन हो जाएंगे।

25 जुलाई की वह सुबह सामान्य थी। हल्की बारिश हो रही थी। मैदान गीला होने के कारण राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय के करीब 40 बच्चों को एक कमरे में बैठा दिया गया। बच्चे प्रार्थना शुरू होने का इंतजार कर रहे थे। तभी छत से प्लास्टर और छोटे-छोटे कंकड़ गिरने लगे। कुछ बच्चों ने बाहर निकलकर शिक्षकों को इसकी जानकारी भी दी, लेकिन खतरे की गंभीरता समझने का समय ही नहीं मिला।

कुछ ही सेकंड बाद एक तेज धमाका हुआ और पूरी छत भरभराकर बच्चों पर आ गिरी। जो बच्चे पहले बाहर निकल आए थे, वे बच गए, लेकिन कई मासूम मलबे और टूटी पट्टियों के नीचे दब गए। कुछ ही पलों में स्कूल परिसर दर्द, चीखों और अफरा-तफरी से भर गया। गांव के लोग दौड़ते हुए पहुंचे। किसी ने नंगे हाथों से पत्थर हटाए, किसी ने मलबा उठाया, कोई अपने बच्चे का नाम पुकारता रहा।

उस दिन को याद कर आज भी सहम जाते हैं कई बच्चे

हर किसी को उम्मीद थी कि शायद कोई और बच्चा जीवित मिल जाए। लेकिन सात परिवारों के हिस्से में ऐसी पीड़ा आई, जिसने उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। इस हादसे में मीना (10), उसका छोटा भाई कान्हा (7), कुन्दन (10), हरीश (11), प्रियंका (12), पायल (13) और कार्तिक (8) की मौत हो गई। 21 बच्चे घायल हुए, जिनमें नौ बालिकाएं थीं। दस बच्चों को गंभीर हालत में झालावाड़ के एसआरजी चिकित्सालय में भर्ती कराया गया, जहां कई दिनों तक उनका उपचार चला।

हादसे से बचे कई बच्चे आज भी उस दिन को याद कर सहम जाते हैं। एक साल बाद भी गांव में वह दर्द जस का तस है। जिन घरों में कभी स्कूल जाने की तैयारी होती थी, वहां आज उन बच्चों की तस्वीरें दुखद याद बन चुकी हैं। पुराने स्कूल भवन के पास से गुजरते हुए लोग आज भी अनायास रुक जाते हैं। उस जगह को देखकर हादसे की तस्वीरें आंखों के सामने तैरने लगती है।

पहली बरसी पर पूरा गांव सातों बच्चों को श्रद्धांजलि देगा

आज हादसे की पहली बरसी पर पूरा गांव सातों बच्चों को श्रद्धांजलि देगा। पुराने जमींदोज स्कूल भवन की भूमि पर उनकी स्मृति में बाल उद्यान विकसित किया जा रहा है। यहां पौधरोपण होगा और पहली से आठवीं कक्षा के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को सम्मानित किया जाएगा। दिवंगत बच्चों की आत्मा की शांति के लिए सर्वधर्म प्रार्थना भी होगी, लेकिन पहली बरसी सिर्फ स्मरण का अवसर नहीं है। यह आत्ममंथन का भी दिन है। सवाल यह है कि क्या उन सात मासूमों की मौत से हमने कोई सबक लिया? क्या प्रदेश के सभी स्कूल भवन सुरक्षित है? क्या ऐसी त्रासदी फिर कभी नहीं दोहराई जाएगी? पिपलोदी और पूरे प्रदेश के सरकारी स्कूलों के बच्चों को आज भी इन्हीं सवालों के जवाब का इंतजार है।

Updated on:
25 Jul 2026 07:15 am
Published on:
25 Jul 2026 07:15 am