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‘अब राखी किसको बांधेंगे?’, रोने लगी इकलौते भाई को खोने वाली चारों बहनें, झालावाड़ स्कूल हादसे में 7 बच्चों की हुई थी मौत

Jhalawar Tragedy: झालावाड़ के पिपलोदी स्कूल हादसे को एक साल पूरा होने के बाद भी 7 मासूमों की मौत का दर्द गांव में कायम है। हादसे में इकलौते भाई कार्तिक को खोने वाली चारों बहनें आज भी भावुक होकर पूछती हैं 'अब राखी किसको बांधेंगे?'
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झालावाड़

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Akshita Deora

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जयप्रकाश सिंह

Jul 23, 2026

Jhalawar School Collapse

मृतक बच्चों को याद करते परिजन एयर इनसेट में कार्तिक की फाइल फोटो: पत्रिका

Jhalawar School Building Collapse: 25 जुलाई को पिपलोदी स्कूल हादसे को एक वर्ष पूरा हो जाएंगे लेकिन गांव के लिए समय मानो उसी मनहूस दिन पर थम गया है। 7 मासूमों को खोने का दर्द आज भी गांव के हर घर में महसूस किया जा सकता है। हादसे में घायल कई बच्चे आज भी शारीरिक और मानसिक पीड़ा झेल रहे हैं। जिन आंगनों में कभी बच्चों की किलकारियां गूंजती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है। माता-पिता आज भी अपने बच्चों की तस्वीरें देखकर भावुक हो जाते हैं और उनकी आंखें नम हो जाती हैं।

पिछले साल 25 जुलाई की सुबह मनोहरथाना ब्लॉक के पिपलोदी गांव स्थित राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय के एक कक्ष की छत भरभराकर गिर गई थी। मलबे में दबने से सात छात्र-छात्राओं की मौत हो गई थी, जबकि 21 बच्चे घायल हुए थे। इनमें से एक दर्जन से अधिक बच्चे 15 से 20 दिन तक एसआरजी चिकित्सालय के आईसीयू में भर्ती रहे थे। हादसे के बाद जनप्रतिनिधियों और वरिष्ठ अधिकारियों का गांव में लगातार आना जाना लगा रहा। पीडि़त परिवारों को हरसंभव सहायता, गांव के समग्र विकास, स्कूलों की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के कई वादे किए गए। जिला प्रशासन ने पिपलोदी को आदर्श ग्राम घोषित किया। ग्रामीणों को उम्मीद थी कि इस त्रासदी के बाद गांव की तस्वीर बदल जाएगीए लेकिन एक वर्ष बाद भी अधिकांश घोषणाएं पूरी तरह धरातल पर नहीं उतर सकी हैं।

आज भी शरीर पर हैं हादसे के निशान

हादसे में घायल अनुराधा, आरती, सायना और बीरम आज भी उस दर्द को झेल रहे हैं। ये स्कूल से घर लौटते समय रास्ते में ही मिल गए। आरती के दोनों पैरों में फैक्चर हुआ था। आज भी कुछ दूरी चलने पर उसके पैरों में सूजन आ जाती है। सायना के हाथ पर टांकों के निशान हैं, जबकि बीरम के पेट में गंभीर चोट के कारण 13 टांके लगे थे। शरीर पर मौजूद ये निशान उन्हें उस भयावह हादसे की याद बार-बार दिलाते हैं।

राखी से पहले नम हुईं बहनों की आंखें

हादसे में जान गंवाने वाला 8 साल का कार्तिक अपने परिवार का इकलौता बेटा था। उसकी चारों बहनें रोते-रोते बोली कि 'अब हम राखी किसको बांधेंगे? त्योहार नजदीक आते ही भाई की याद और सताने लगती है। अब राखी का त्योहार खुशियों से ज्यादा दर्द बन गया है।'

भामाशाह के मकान में चल रहा स्कूल, नया भवन अब भी निर्माणाधीन

राजस्थान सरकार ने हादसे के बाद गांव में करीब डेढ़ करोड़ रुपए की लागत से आधुनिक विद्यालय भवन बनाने की घोषणा की थी। गांव के भामाशाह मोर सिंह ने विद्यालय संचालन के लिए अपना मकान निशुल्क उपलब्ध कराया। पिछले एक वर्ष से विद्यालय उनके मकान के दो कमरों और बरामदे में संचालित हो रहा है। वर्तमान में यहां 75 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं और सात शिक्षक कार्यरत हैं। गांव से करीब आधा किलोमीटर दूर कोलूखेड़ी रोड पर नए विद्यालय भवन का निर्माण चल रहा है। यहां 10 कमरों का निर्माण किया जा रहा है। निर्माण कार्य दीपावली तक पूरा होने की उम्मीद जताई जा रही है।

अब आई बाल उद्यान की याद

पत्रिका टीम जब पिपलोदी पहुंची तो पुराने विद्यालय परिसर में आनन-फानन में मरम्मत, रंगाई-पुताई और पौधरोपण का कार्य चल रहा था। ग्रामीण कैलाश, कालूलाल, रामविलास, परमानंद, लखन और हरिराम ने बताया कि हादसे के बाद से यह स्थान लंबे समय तक यूं ही पड़ा रहा। अअब यहां बाल उद्यान विकसित किया जा रहा है। शनिवार को जिला कलक्टर पौधरोपण कर बाल उद्यान का लोकार्पण करेंगे।

ठंडे बस्ते में चले गए कई वादे

ग्रामीणों का कहना है कि हादसे के बाद कुछ समय तक प्रशासनिक गतिविधियां तेज रही और कई घोषणाएं हुईं। लेकिन समय बीतने के साथ अधिकांश काम ठंडे बस्ते में चले गए। गांव की सडक़ें आज भी जर्जर हैं। नए विद्यालय भवन का निर्माण अधूरा है। पेयजल की समस्या बनी हुई है। गांव में बनाई गई पानी की टंकी भी समय पर संचालित नहीं होती। ग्रामीण ट्रांसफार्मर लगाने की मांग कर रहे।

बच्चों को खोने के बाद छोड़ दिया गांव

हादसे में छोटूलाल की 10 साल की बेटी मीना और 7 साल के बेटे कान्हा की मौत हो गई थी। दोनों बच्चों को खोने के बाद पति-पत्नी पूरी तरह टूट गए और कुछ समय बाद गांव छोड़कर मनोहरथाना में रहने लगे। छोटूलाल के पिता मांगीलाल बताते हैं कि दोनों हमेशा बच्चों को याद कर रोते रहते थे। हादसे के बाद दोनों को संविदा पर नौकरी मिल गई। अब वे मनोहरथाना में रहकर काम करते हैं और कभी कभार ही गांव आते हैं।

निर्माण राशि का अब भी इंतजार

मृतका पायल के पिता लक्ष्मण ने बताया कि मृतकों और घायलों के परिजनों को कैटल शेड निर्माण के लिए एक-एक लाख रुपए देने की घोषणा की गई थी। 17 परिवारों ने कैटल शेड का निर्माण भी करा लियाए लेकिन निर्माण की राशि आज तक नहीं मिली। कई बार अधिकारियों से मिलने के बाद भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। मृतक हरीश की दादी प्रेमबाई कहती हैं, ‘आज भी पुराने स्कूल की तरफ देखती हूं तो लगता है कि मेरा पोता पढक़र घर लौट रहा है। कुंदन और कार्तिक के परिजनों का कहना है कि सरकार से अपेक्षित आर्थिक सहायता भी पूरी तरह नहीं मिल सकी। बेटे कुंदन भील को खो चुकीं मां पारवारी बाई आज भी उस सदमे से उबर नहीं सकी हैं।