
गजेन्द्र सिंह दहिया/जोधपुर. गुजरात में साढे 7 हजार 500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले कच्छ के रण में खेती की आस जगने लगी है। शुष्क वन अनुसंधान संस्थान (आफरी) के वैज्ञानिकों ने विलायती बबूल (प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा) की बढ़त को रोककर टूथपेस्ट ट्री (खारा जाल या सेल्वेडोरा पर्सिका) सहित 3 अन्य प्रजाति के पौधे स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है। इस प्रयोग से खारी मिट्टी को काफी हद तक उपचारित कर दिया गया है।
इसी क्रम में वैज्ञानिकों ने जोधपुर के पास लूणी नदी के केचमेंट एरिया में 22 साल की मेहनत से बाजरा और ग्वार की फसल उगाई है। यहां नमक की क्यारियां थी जहां स्थानीय निवासी नमक बनाते थे। फसलें होने से यहां के लोग अब कृषि की तरफ मुड़ गए हैं। यहां मिली सफलता के बाद वैज्ञानिक कुछ नई तकनीक का प्रयोग करके कच्छ के रण में भी अनाज की फसलें लेने का प्रयास कर रहे हैं।
1997 में शुरू किया मिट्टी का उपचार
आफरी ने जोधपुर के पास गंगाणी गांव और कच्छ के रण की लवणीय भूमि को उर्वर बनाने के लिए सन् 1977 में शोध शुरू किया। गंगाणी गांव में भवाद नदी बहती है। लूणी नदी का कैचमेंट एरिया होने से यहां का पानी खारा है। जमीन में लवण अधिक होने और उबड़-खाबड़ होने से जिप्सम और नाइट्रोजन की खाद डाली गई। इसके बाद मिट्टी के दो बड़े टीलों के बीच पौधे लगाए गए। मानसून की समाप्ति पर लवणता उच्च स्तर पर मिट्टी के टीलों तक पहुंच पाई, लेकिन पौधे सुरक्षित रह गए और विकसित हुए। यहां टूथपेस्ट ट्री लगाया गया, जिसमें 5 साल बाद फल भी आने शुरू हो गए। इन फलों पर पक्षियों के बैठने से इनके बीज इधर उधर बिखरे। इससे पूरे क्षेत्र में खारा जाल फैल गया। कुछ समय बाद यहां बाजरा व ग्वार की खेती भी हो गई। वर्तमान में यहां 10 वैरायटी की घास और 18 प्रजाति के पौधे मिलते हैं।
कच्छ के रण में पीएच ज्यादा
गंगाणी में सफलता मिलने के बाद वर्ष 2012 में आफरी ने कच्छ के रण की ओर रुख किया। रण में मिट्टी का पीएच अत्यधिक होने से जिप्सम की जगह बाजरे व गेहूं की भूसी, यूरिया और गोबर की खाद मिलाकर जमीन का उपचार किया गया। वैज्ञानिकों को इसमें सफलता मिली। लूणी नदी इस क्षेत्र में आकर खत्म होती है। यहां विलायती बबूल की बढ़त को रोककर खारा जाल के साथ दो अन्य प्रजातियां अकेशिया एम्पेसेक्स और अकेशिया बाइवीनोसा के पौधे लगाए गए हैं। मिट्टी को थोड़ा और उपचार करने के बाद यहां अनाज होने की उम्मीद है।
नमक को कम करना मुश्किल था
‘जहां पहले नमक बनाया जाता था, वहां अब अनाज की फसलें हो रही है। इससे कच्छ के रण में भी खेती की उम्मीद जगी है।
डॉ रंजना आर्या, पूर्व वैज्ञानिक, शुष्क वन अनुसंधान संस्थान, जोधपुर