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Rajasthan : अब डीपफेक की हकीकत खोलेगा जोधपुर-मद्रास IIT का ‘साक्ष्य’, AI एजेंट बताएंगे फर्जी वीडियो की पूरी कहानी

Jodhpur : डीपफेक की 'साक्ष्य' हकीकत खोलेगा। 'साक्ष्य' पर आइआइटी जोधपुर और आइआइटी मद्रास मिलकर काम कर रहे हैं। पूरा होने पर एआइ एजेंट फर्जी वीडियो की पूरी कहानी बताएंगे।
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Jodhpur : फोटो - AI

Jodhpur : सोशल मीडिया पर तेजी से बढ़ रहे डीपफेक वीडियो, फर्जी ऑडियो और एआइ से तैयार तस्वीरों के बीच उनकी हकीकत का पता लगाने के लिए आइआइटी जोधपुर और आइआइटी मद्रास मिलकर अत्याधुनिक एआइ फ्रेमवर्क विकसित कर रहे है। इसका नाम 'साक्ष्य' रखा गया है। यह परियोजना भारत सरकार के इंडिया एआइ मिशन के सेफ एंड ट्रस्टेड एआइ कार्यक्रम के तहत चुनी गई है। इसका उद्देश्य केवल किसी कंटेंट को डीपफेक बताना नहीं, बल्कि उसके पीछे मौजूद डिजिटल साक्ष्यों का विश्लेषण कर विश्वसनीय निष्कर्ष और गवर्नेस संबंधी सुझाव देना है।

एक एआइ नहीं, कई एजेंट करेंगे जांच

'साक्ष्य' की खासियत इसका मल्टी एजेंट फ्रेमवर्क है। इसमें एक ही एआइ मॉडल पर निर्भर रहने के बजाय कई एआइ एजेंट मिलकर डिजिटल कंटेंट की अलग-अलग स्तर पर जांच करेंगे। वीडियो, ऑडियो और अन्य डिजिटल सामग्री में मौजूद संकेतों का विश्लेषण कर अलग-अलग एजेंट अपने निष्कर्ष देंगे। इसके बाद इन निष्कर्षों को मिलाकर कंटेंट की विश्वसनीयता का आकलन किया जाएगा। आइआइटी जोधपुर और आइआइटी मद्रास इस पर तेजी से काम कर रहे हैं।

रेग तकनीक से बाहरी प्रमाण भी जुड़ेंगे

फ्रेमवर्क में रिटराइवल-ऑगमेंटेड जनरेशन (रेग) तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इसका मतलब है कि एआइ केवल अपने प्रशिक्षण से मिली जानकारी के आधार पर निर्णय नहीं लेगा, बल्कि जरूरत के अनुसार विश्वसनीय स्रोतों और उपलब्ध जानकारी को हासिल कर उसका विश्लेषण भी करेगा। इससे डीपफेक की पहचान के साथ उसके निष्कर्ष के पीछे मौजूद प्रमाणों को समझने में मदद मिलेगी।

फर्जी वीडियो से लेकर डिजिटल फ्रॉड तक पर नजर

एआइ से तैयार या बदले गए वीडियो का इस्तेमाल गलत सूचना फैलाने, किसी व्यक्ति की छवि खराब करने, ठगी और अन्य डिजिटल अपराधों में किया जा रहा है। ऐसे में साक्ष्य का फोकस एआइ जनरेटेड मिस इंफोर्मेशन और मेनिपुलेटेड मीडिया से निपटने पर है। सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य डीपफेक डिटेक्शन के साथ उसके उपयोग और प्रभाव से जुड़े गर्वनेंस पहलुओं को भी मजबूत करना है।

यह होगा बदलाव

भविष्य में यह तकनीक मीडिया संस्थानों, साइबर जांच एजेंसियों और अन्य संस्थानों को संदिग्ध डिजिटल सामग्री की जांच में मदद करेगी। खास बात यह होगी कि सिस्टम केवल 'फेक' या 'रियल' का जवाब देने के बजाय निर्णय के पीछे मौजूद साक्ष्यों और विश्लेषण को भी सामने लाने की दिशा में काम करेगा। इसके आने के बाद से बहुत से लोगों को इससे राहत मिलेगी। सच और झूठ का पता साक्ष्य के साथ चल जाएगा।