जोधपुर

हादसों का हाई-वे : बालेसर में ट्रोमा सेंटर होता तो बच जाती कुछ जिंदगियां

जोधपुर/बालेसर. बालेसर के ढाढणियां में शुक्रवार को मिनी बस व कैम्पर की भिड़ंत में घायलों को तत्काल चिकित्सा सुविधा मिलती तो कुछ लोगों की जान बच सकती थी।
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Sep 29, 2019
Balesar : Troma center proposal not approved
हादसों का हाई-वे : बालेसर में ट्रोमा सेंटर होता तो बच जाती कुछ जिंदगियां

जोधपुर/बालेसर. बालेसर के ढाढणियां में शुक्रवार को मिनी बस व कैम्पर की भिड़ंत में घायलों को तत्काल चिकित्सा सुविधा मिलती तो कुछ लोगों की जान बच सकती थी।

चिकित्सकों के अनुसार बालेसर में ट्रोमा सेंटर होता तो हादसे में गंभीर घायलों को तत्काल जीवनरक्षक उपचार मिल जाता, लेकिन बालेसर में ट्रोमा सेंटर नहीं होने से सभी घायलों को प्राथमिक उपचार के बाद जोधपुर रैफर करना पड़ा।

चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग ने कई महीने पहले बालेसर सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र को ट्रोमा सेंटर के तौर पर विकसित करने का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन सरकार से अभी तक मंजूरी नहीं मिली।

उल्लेखनीय है कि राजमार्ग 125 पर जोधपुर से पोकरण के बीच होने वाले सडक़ हादसों के सभी घायलों को बालेसर ही लाया जाता है। इनमें से ज्यादातर घायलों की मौत समय पर उपचार के अभाव में होती है। यहां की जनता लंबे समय से ट्रोमा सेंटर की मांग उठा रही है। जानकार बता रहे हैं कि बालेसर अस्पताल की विवादित जमीन ट्रोमा सेंटर के आड़े आ रही है।

जोधपुर से रामदेवरा तक 182 किलोमीटर की दूरी में बालेसर, फलोदी सीएचसी अस्पताल तो हैं, लेकिन एक भी ट्रोमा सेंंटर नहीं है। जबकि जयपुर हाईवे पर बिलाड़ा में ट्रोमा सेंटर शुरू होने के बाद सडक़ दुर्घटनाओं में मृतकों की संख्या में कमी आई। वहीं बालेसर में गत डेढ़ साल में 9 सडक़ दुर्घटनाओं में 28 लोगों की मौत हो गई। वहीं 23 घायल हुए।

हर समय विशेषज्ञ चिकित्सक चाहिए, यहां तो कई पद ही रिक्त

जानकारों के अनुसार सर्वाधिक हादसों वाले मार्गों के समीप ग्रामीण इलाकों में 24 घंटे सर्जरी, एनेस्थेसिया, ऑर्थोपेडिक, मेडिसिन व आवश्यक संसाधन उपलब्ध नहीं होते। जबकि घायल को हो रहे रक्तस्राव को तत्काल रोक लिया जाए तो भी उसकी जान बचने की संभावना बढ़ सकती है। बालेसर सीएचसी में मोर्चरी भी नहीं है। यहां खुले में पोस्टमार्टम किए जाते हैं और शव रखने में परेशानी आती है। चिकित्सकों के कई पद खाली पड़े हैं। अस्पताल भवन भी जर्जर है।

एक्सपर्ट व्यू

समय पर मिले ए,बी,सी,डी ट्रीटमेंट तो बचे जान

घायलों की जान बचाने के लिए ए, बी, सी और डी ट्रीटमेंट की आवश्यकता होती है। ए मतलब एयर वे यानी संक्शन करना, बी यानी ब्लीडिंग रोकना और ऑक्सीजन देना, सी मतलब सर्कुलेशन, ब्लड चढ़ाना और समय पर एक्सरे कराना और डी का मतलब ड्रग यानी दवा देने से है। इन नियमों को फॉलो करके रास्ते में होने वाली मौतों को रोका जा सकता है।

- डॉ. महेन्द्रकुमार आसेरी, अधीक्षक, मथुरादास माथुर अस्पताल

Published on:
29 Sept 2019 09:41 am