
जोधपुर. जो खुद निर्बल होते हुए भी बच्चों को सबल बनाने के लिए शिक्षक के रूप में सेवाएं दे रहा था। उसके लिए हमारा सिस्टम इतना निर्बल हो चुका है कि उसकी अत्येंष्टी के लिए चार लोग भी पूरे नहीं जुट सके। यहां तक उसकी पार्थिव देह को चिता तक पहुंचने के लिए उसके ही नेत्रहीन साथियों को धूप और तपिश में कई श्मशानों में भटकना तक पड़ा। आखिरकार 'ईश्वरÓ को रहम आ ही गया। भटकते फिर रहे नैनहीनों को 'ईश्वरÓ और मुकेश गोदावत जैसे सेवाभावी लोगों के रूप में राह दिखाई। सिवांचीगेट स्थित ओसवाल स्वर्गाश्रम में कोविडकाल के दौरान लंबे अर्से से सेवाएं देने वाले 'ईश्वरÓ और मुकेश ने पीपीई किट पहनकर निगम कर्मचारियों के सहयोग से संक्रमित शव को वाहन से नीचे उतारा। आखिरकार करीब एक घंटे तक भटकने के बाद कोरोना संक्रमित नेत्रहीन अध्यापक जयप्रकाश गहलोत का दाह संस्कार कोविड प्रोटोकॉल के तहत नि:शुल्क हुआ। कोविडकाल में जब चौतरफा संवेदनाएं और साधन मृतप्राय हो चुके है ऐसे में कुछ सेवाभावी लोगों के कारण ही इंसानियत अभी तक बाकी है।
मासूम बच्चों का रो-रो कर बुरा हाल, ट्यूशन पढ़ चुके युवा ने चुकाई गुरु दक्षिणा
एम्स में 29 अप्रेल से भर्ती रहे दत्तोपत्त ठेंगड़ी नगर निवासी 44 वर्षीय फस्र्ट ग्रेड नेत्रहीन अध्यापक जयप्रकाश गहलोत (घांची ) पुत्र भोमाराम की मंगलवार को कोरोना संक्रमण से मौत हो गई। संक्रमित होने के बाद दिव्यांग अध्यापक के पास एकमात्र 20 वर्षीय शिष्य महावीर चौहान ही थे जो बीमार होने पर उनकी सेवा कर रहे थे। दिवंगत नेत्रहीन अध्यापक पास ट्यूशन पढ़ चुके बिरामी ग्राम निवासी महावीर सिंह चौहान ने बताया कि एम्स से जब बॉडी सुपुर्द की गई तो पहले कुछ भी समझ में नहीं कि क्या करे। मेरे साथ जेपी सर के दो साथी नेत्रहीन अध्यापक थे। जयप्रकाश की पत्नी भी नेत्रहीन होने के कारण घर पर ही थी। उनके बच्चे 12 वर्षीय नरेश और 14 वर्षीय हर्षिता का रो-रो कर बुरा हाल था। ऐसे में नियंत्रण कक्ष से सहयोग मांग कर वाहन का इंतजाम किया। जब हम सिवांचीगेट स्थित हिन्दू सेवा मंडल के श्मशान पहुंचे तो उन्होंने चिता स्थल खाली नहीं होने के कारण मना कर दिया। ऐसे में राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित एक समाचार के माध्यम से ओसवाल स्वर्गाश्रम के सेवाभावी युवा का स्मरण आया तो हम वहां पर पहुंचे। वहां पर मुकेश गोदावत ने दो मिनट में पूरी बात समझी और तुरंत दाह संस्कार सामग्री का नि:शुल्क इंतजाम कर दिया।