
जोधपुर.
आज ये अफसर जोधपुर शहर में बड़े पदों पर आसीन हैं। पद के अनुसार इनका अपना रूआब है, लेकिन इनके बाल्यकाल का दूसरा पहलू बेहद रोचक है। ये तीनों अफसर अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान क्लास से बंक करते थे। ये अपने सहपाठियों को डराकर बेहद खुश होते थे, कई बार बाहर से मेढ़क पकड़कर ले आते और सहपाठियों के बैग में डाल देते। इन्हें क्लास टीचर सजा के बतौर बाहर खड़ा कर देते थे या कई बार मुर्गा तक बना देते थे। मित्रता दिवस की पूर्व संध्या पर कई सालों बाद मिले इन दोस्त अफसरों ने अपनी बचपन की यादें ताजा कि तो हंसी के फव्वारे फूट पड़े। ये तीन दोस्त है, एसएन मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. एस. एस. राठौड़, केन्द्रीय शुष्क वन अनुसंधान संस्थान-आफरी के निदेशक डॉ. इन्द्रदेव आर्य और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. सुनील कुमार बिस्ट। जो वर्तमान में शहर के तीन प्रमुख पदों पर आसीन है।
यादें ताजा करने लगे तो कई बातें निकल पड़ी। बताते हैं कि ये दोस्त अपने स्कूली पढ़ाई के दौरान खूब शैतानी करते थे। भले ही छोटे थे, लेकिन कैंची साइकिल चलाकर स्कूल जाते थे। चूंकि इन तीनों मित्रों के पिता शहर में अच्छे पदों पर सरकारी नौकरी पर थे, इसलिए ये परिवार में लाडलों से कम नहीं थे। तब साइकिल होना भी रईस माना जाता था, जो साइकिल लेकर स्कूल जाता था, उसका अपना रूतबा होता था।
इसे अजीब संयोग ही मान सकते हैं कि बचपन के तीन दोस्त साथ खेले, पढ़े और आज एक ही जगह पर अच्छे मुकाम पर पुन: मिल गए। तीनों ही मित्र वर्ष 197२-73 में चौथी व पांचवी कक्षा तक जोधपुर के केन्द्रीय विद्यालय-1 (एयरफोर्स) में साथ पढ़े थे। चूंकि सभी का जोधपुर में साथ पढऩा भी संयोग ही था। क्योंकि तीनों के पिता सरकारी जॉब में यहां तैनात थे। दो मित्रों के पिता के तबादले होते गए तो तीनों साथी बिछड़ते गए। तीनों बिछड़े साथियों की जब जोधपुर वापसी हुई तो शहर के प्रमुख तीन पदों पर आसीन होकर आए। तीनों को बचपन में साथ खेलने, पढऩे और क्लास बंक कर लंच करने और बचपन में बदमाशी करने की यादें आज भी याद है। वे जब भी सपरिवार मिलते हैं तो इनकी बचपन की बातें सुनकर इनके परिवार के सदस्य भी गदगद हो जाते हैं। तीनों मित्रों का मानना है कि जीवन में अच्छी मित्रता बेहद जरूरी है। वे कहते हैं कि असली मित्रता उनके जमाने में ही थी। अब तो मोबाइल आने के बाद फेसबुक-व्हाट्सऐप पर ई-मित्रता का दौर आ गया है।
डॉ एस. एस. राठौड़-
एसएन मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. शैतानसिंह राठौड़ मूलत सिरोही जिले शिवगंज के बडग़ांव के निवासी है। इनके पिता एन. एस. राठौड़ फौज में कर्नल थे। इसलिए पिता की ट्रांसफर के साथ उनका स्थान बदलता गया। जन्म दिल्ली में हुआ, लेकिन प्राइमरी की पढ़ाई जोधपुर में हुई। कक्षा 4 व 5 की पढ़ाई केवी-1 एयरफोर्स में की। 18 साल बाद वर्ष 1993 में डॉक्टर के रूप में जोधपुर वापसी हुई। तब से जोधपुर मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर रहते हुए वर्तमान में कॉलेज में प्रिन्सीपल की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
डॉ. इन्द्रदेव आर्य-
केन्द्रीय शुष्क वन अनुसंधान संस्थान-आफरी के निदेशक डॉ. इन्द्रदेव आर्य का जन्म जोधपुर के उम्मेद अस्पताल में हुआ। मूल जयपुर निवासी आर्य के पिता डॉ. एस. सी. आर्य जेएनवीयू में बॉटनी डिपार्टमेंट के विभागाध्यक्ष रहे। एमएससी तक पढ़ाई जोधपुर में की और फिर पोस्ट डॉक्टरेट की पढ़ाई के लिए स्वीडन व इंग्लैण्ड में रहे। करीब 25 साल बाद जोधपुर लौटे। दस साल से ऑफरी में पदस्थापित है।
डॉ. सुनील कुमार बिस्ट-
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. सुनील कुमार बिस्ट का जन्म भी उम्मेद अस्पताल में हुआ। इनका परिवार मूलत: उत्तराखण्ड निवासी है। पिता रेलवे नौकरी में थे। इसलिए जोधपुर आ गए यहां रेलवे कॉलोनी में रहते थे। एमबीबीएस तक की पढ़ाई जोधपुर में की। हॉकी के अच्छे प्लेयर रहे हैं। उच्च शिक्षा व डॉक्टरी की नौकरी के कारण 25 साल बाद सीएमएचओ के रूप में पदस्थापित होकर जोधपुर लौटे।
ऐसे करते थे बचपन की शैतानी--
-वर्ष 1972-73 में तीनों मित्र केवी-1 एयरफोर्स में पढ़ते थे। तीनों उस समय प्राइमरी क्लास बंक कर लंच करने जाते थे और बबूल की झाडिय़ों के बीच छिपकर लंच करते थे।
-प्राइमरी कक्षाओं में पढऩे के दौरान वे उम्र में जरूर छोटे थे, फिर भी साइकिल कैंची चलाकर स्कूल जाते थे।
-बरसात के समय बाहर से मेंढ़क पकड़ ले आते थे और अन्य विद्यार्थियों के बैग में डाल देते थे।
-इनकी शैतानी पर इनको क्लास टीचर कई बार क्लास में बाहर खड़ा कर देते थे या मुर्गा तक बना देते थे।