
जोधपुर। जिस जलाशय ने दशकों तक रहवासियों के प्यासे हलक तर किए, आज उसकी गोद में उन्हीं के घरों से निकले कूड़े और सीवरेज का स्थायी ठिकाना है। लोगों ने तालाब को पाटकर अपने आशियाने खड़े कर दिए और जल प्रवाह के उन रास्तों को बंद कर दिया, जो बारिश के पानी को पनाह तक पहुंचाते थे। यह दुर्दशा है शहर के ऐतिहासिक गंगलाव तालाब की, सालों से भागीरथ का इंतजार करते करते यह जलाशय अब दम तोड़ चुका है।
स्वार्थ की भेंट चढ़े इस तालाब को पिछले दो-तीन दशकों में सबसे बुरे दौर का सामना करना पड़ा है। न जिम्मेदार शहरी निकाय ने सुध ली और न ही रहवासियों ने इसके प्रति कृतज्ञता दिखाई। सरकार और जनप्रतिनिधि भी मूकदर्शक बने रहे और धीरे-धीरे बेहतरीन जल संग्रह प्रणाली का प्रतीक यह तालाब मलबे में दफन हो गया। गंगलाव का निर्माण वर्ष 1518 में मारवाड़ के तत्कालीन राजा राव गंगा सिंह ने करवाया था। तब यह तालाब शहर में पेयजल का स्रोत हुआ करता था, जिसमें आसपास के पहाड़ियों से पानी की आवक होती थी। सिवांची गेट से आगे बकरा मंडी के समीप स्थित यह तालाब आज अतिक्रमण और अवैध निर्माण की गिरफ्त में है। जल आवक क्षेत्रों में अवैध निर्माणों के चलते पिछले कई सालों से तालाब में बरसाती पानी की आवक नहीं हुई है। तालाब में स्थित कुओं के भूमिगत स्तर के कारण सीमित मात्रा में जल की उपलब्धता है, जिसमें सर्वत्र जलकुम्भी का साम्राज्य है। तालाब पूरी तरह कचरा घर बन चुका है। आसपास के लोगों ने मलबा और कचरा डालकर जलभराव क्षेत्र को अतिक्रमित कर लिया है।
देखते ही देखते हो गए 84 अवैध निर्माण
तालाब के चारों और अवैध निर्माण कुकुरमुत्तों की तरह फैल रहे हैं। खुद नगर निगम ने अपने सर्वे में यह माना है कि तालाब के चारों ओर 84 आवासीय निर्माण, एक मस्जिद, दो मंदिर, एक सामुदायिक बगीची तथा एक सार्वजनिक हॉल का निर्माण हो चुका है। आसपास के रहवासियों ने अपने घर के सीवरेज की निकासी के लिए नालियों के मुंह तालाब में खोल दिए हैं, जिससे न केवल उपलब्ध पानी पूर्ण रूप से प्रदूषित हो चुका है, बल्कि आसपास का पर्यावरण संतुलन भी प्रभावित हो रहा है। हाल ही तालाब में उपलब्ध प्रदूषित पानी के नमूनों की जांच में चौंकाने तथ्य सामने आया है। जांच रिपोर्ट के अनुसार तालाब के पानी का टीडीएस 856 पाया गया है, जबकि मानवीय उपभोग के लिए स्वीकार्य सीमा 150 टीडीएस ही है। निगम ने यह मान लिया है कि तालाब का पानी अब पीने योग्य नहीं है।
धरातल पर नहीं उतरी कायाकल्प की योजनाएं
अवैध निर्माणों को सम्मिलित करते हुए गंगलाव तालाब का कुल क्षेत्रफल 26774 .72 वर्ग मीटर है, जिनमें से केवल 9752 .64 वर्ग मीटर (36.42 प्रतिशत ) क्षेत्रफल ही पुनरुद्धार के योग्य है। नगर निगम ने वर्ष 2016 में गंगलाव के संरक्षण एवं विकास के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करवाई थी, जिसके तहत तालाब में उगी वनस्पति और मलबे को हटाने, जलाशय के चारों और रिटेनिंग दीवार, बरसाती जल की नहर का निर्माण, चार दिवारी और मुख्य गेट का निर्माण, पार्किंग स्थल, तालाब के चारों ओर सीवर लाइन बिछाने, ओवरफ्लो निस्तारण सहित तालाब में स्थित पुरातत्व महत्व के भवनों की मरम्मत का कार्य प्रस्तावित किया गया था। करीब 6.02 करोड़ रुपए की इस योजना को बजट के अभाव में ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया गया है। पर्यटन विभाग ने वर्ष 2019 -20 में तालाब के चारों ओर चारदीवारी और मुख्य द्वार निर्मित करने के लिए 1.5 करोड़ रुपए की वित्तीय स्वीकृति दी थी, जिसके लिए सार्वजनिक निर्माण विभाग को कार्यकारी जैसी बनाया गया है। अधिकारियों का दावा है कि 80 प्रतिशत काम पूर्ण कर लिया गया है लेकिन यह कवायद भी बेमतलब रही। इसी तरह राज्य सरकार ने भी वर्ष 2019 - 20 में गंगलाव सहित एक अन्य तालाब के पुनरुद्धार के लिए 20 लाख रुपए का प्रावधान किया था। हालांकि यह राशि ऊंट के मुंह में जीरा है मगर यह राशि भी फिलहाल नगर निगम उत्तर को नहीं मिल पाई है। राशि प्राप्त करने के लिए निगम ने सरकार को प्रस्ताव भेजा है।