
क्या कभी पी है आपने जोधपुर की हूबड़ कढ़ी
-सदियों पुरानी स्पाइसी रेसिपी से अनजान नई पीढी
--ऑफ बीट--
अभिषेक बिस्सा
जोधपुर. खान-पान के लिए मशहूर सूर्यनगरी में मिर्ची बड़ा और मावा कचौरी खासी प्रसिद्ध है, लेकिन पुराने जमाने की ऐसी कई रेसिपी हैं जो खाने में स्वादिष्ट होने के साथ पौष्टिक भी हैं, पर इनका स्वाद कभी-कभार ही चखने को मिलता है। इनमें शामिल ‘हूबड़ कढ़ी’ भी ऐसी ही परम्परागत डिश है।
जायकेदार ‘हूबड़ कढ़ी’ का असली मजा इसे गर्मागर्म पीने में ही है। इसे पीते समय तेज मसालों व फल-सब्जियों के कारण मुंह से हूबड़-हूबड़ आवाज आने के कारण ही इसका नाम ‘हूबड़ कढ़ी’ हो गया। जोधपुर का यह परम्परागत जायकेदार आइटम साल के अंतिम दिन भीतरी शहर में घांची समाज के न्याति नोहरे (थिएटर) में तैयार किया गया।
बेसन से तैयार इस कढ़ी में तमाम मौसमी सब्जियां और फल डाले गए। करीब डेढ़ सौ लोगों के लिए बनाई गई ‘हूबड़ कढ़ी’ में उबाल आने के समय ही लोगों, खासकर युवाओं के मुंह में पानी आना शुरू हो गया। कढ़ी बनने में करीब दो घंटे का समय लगा। हूबड़ कढ़ी से गोठसमाजसेवी गौरीशंकर बोराणा हर साल 31 दिसंबर को गोठ करते हैं। गोठ में हर बार हल्दी की सब्जी बनती थी इसलिए थोड़ी बोरियत महसूस हो रही थी। उन्होंने अपने एक मित्र के आइडिया पर हूबड़ कढ़ी बनाने का मानस बनाया और इसके लिए अपने मित्र जसराज भाटी को तैयार किया। इसमें मगराज बोराणा, धनराज बोराणा, मनीष भाटी, अर्जुन भाटी, कमलेश भाटी, राजेश भाटी व प्रभात बोराणा ने भी सहयोग किया।
फल-सब्जियों से बनती है पौष्टिक
‘हूबड़ कढ़ी’ बनाने के लिए बेसन में दही, छाछ, नमक, मिर्ची, हल्दी, धनिया, गर्म मसाले, नींबू का सत डालकर घोल तैयार किया गया। इस घोल को कढ़ाई में देसी घी गर्म करके छौंका गया और कढ़ी को रढऩे के लिए धीमी आंच पर रख दिया। दूसरी तरफ हरी मिर्च, शिमला मिर्च, आलू, गोभी, पत्तागोभी, लौकी, ककड़ी, रतालू, मटर सहित कई सब्जियां फ्राई करने के बाद कढ़ी के कढाह में डाल दी गई। इसके साथ ही केले, सेव, अमरुद, चीकू , अनार सहित कई तरह के फल भी कढ़ी में डाल दिए। काफी देर तक उबाल आने के बाद में घी में राई और हींग का तडक़ा लगा कढ़ी में डाला गया।
गृहिणियों का सालों पुराना आविष्कार
‘जोधपुर में पौष्टिक खानपान की परम्परा रही है। हूबड़ कढ़ी का आविष्कार मारवाड़ में सदियों पहले गृहिणियों ने ही किया। इस कढ़ी की विशेषता नींबू का सत है। यह इसलिए डाला जाता है ताकि खटाई बनी रहे। क्योंकि इस सीजन में दही व छाछ खट्टी नहीं होती। इस कढ़ी के साथ हूबड़ इसलिए जुड़ा कि इसे गर्म-गर्म पीते वक्त सब्जियां व फल होंठों के बीच आते हैं, इस कारण उन्हें फूंक देकर पीना पड़ता है। इस कारण मुंह से हूबड़-हूबड़ की आवाजें भी आती हैं।
- गोविंद कल्ला, संस्कृतिविद्