राजस्थान शोध संस्थान की ओर से इस संबंध में नई खोज की गई है।
जोधपुर . मारवाड़ का इतिहास सदैव ही समृद्ध रहा है। यहां की नाथ परंपरा भी अनूठी रही है। इससे जुड़ी कई जानकारियां इतिहास की पन्नों में गुम होने लगी हैं। लेकिन बीते दिनों राजस्थान शोध संस्थान की ओर से इस संबंध में नई खोज की गई है। संस्थान के सहायक निदेशक विक्रम सिंह भाटी ने बताया कि जोधपुर के महाराजा जसवन्तसिंह प्रथम के समय गौरखपंथी (गौरक्षनाथ) बाबा मंगलदास की ऐतिहासिक छत्तरी उजागर हुई है। इस छत्तरी के स्तम्भ पर उत्त्कीर्ण शिलालेख से मालूम हुआ कि यह स्मारक स्थल नाथ योगी मंगलदास से सम्बन्धित है। जिसकी स्मृति को चिरस्थाई रखने के लिए केवल राम ने विक्रम संवत् 1723 में इस छत्तरी का निर्माण करवाया था। शिलालेख में योगी मंगलदास को देवपुरुष तुल्य माना गया है।
डॉ भाटी ने बताया कि महाराजा गजसिंह और महाराजा जसवन्तसिंह के समय मालुंगा गांव नाथ धायभाई और चांपावत राठौड़ों के पट्टे में रहा था। आगे चलकर महाराजा अजीतसिंह की ओर से वि.सं. 1764 (1707 ई.) में जुगतसिंह भाटी को मालुंगा गांव सहित पांचला, उलटा (फलौदी) का पट्टा दिया गया। इस गांव में 11वीं से 13वीं शताब्दी के कई दुर्लभ शिलालेख भी खोजे गये हैं। जो प्रतिहार, गुहिल और हूल वंश से सम्बन्धित है। इसलिए इस भूखण्ड क्षेत्र का इतिहास और संस्कृति के क्षेत्र में अलग ही महत्व है।
इन रचनाओं को किया लिपिबद्ध
उल्लेखनीय है कि नाथ योगी मंगलदास योग विद्याओं में निपुण होने के साथ ही साथ इन्होंने अपने गुरु गौरक्षनाथ की रचनाओं में आत्मबोध, दयाबोध, गोरखसार, गोरखवाणी, अष्टमुद्रा इत्यादि को न सिर्फ लिपिबद्ध किया बल्कि योगबल सिद्धांत, शिव आराधना, गुरु महिमा आदि अनेक रचनाएं लिखीं। लोगों में मान्यता है कि जहां छतरी है वहां योगी मंगलदास निराहार रहकर तपस्या करते थे और प्राण त्यागे थे। डॉ भाटी ने बताया कि मालुंगा गांव में इसके अलावा सुरतनाथजी, भींवनाथजी के स्मारक स्थल भी है, जो नाथ सम्प्रदाय से रहे हैं। इस स्मारक के मिलने से इतिहास के कई पन्ने अब खुलने लगेंगे और शोधार्थियों को भी खासी सहायता मिलेगी।