जोधपुर

Rajasthan News : दहेज उत्पीड़न का मामला निकला झूठा- पति और सास बाइज्जत बरी, जानें आखिर कैसे आया ‘यू-टर्न’?

राजस्थान से एक ऐसी खबर सामने आई है, जो समाज और कानूनी व्यवस्था के लिए एक बड़ा सबक है। 13 साल तक चले एक लंबे कानूनी संघर्ष के बाद अदालत ने जो फैसला सुनाया है, उसने न केवल एक परिवार को न्याय दिया है, बल्कि झूठे मुकदमों की बढ़ती प्रवृत्ति पर भी कड़ा प्रहार किया है।

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Mar 17, 2026

राजस्थान के जोधपुर महानगर न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-9 की अदालत ने दहेज उत्पीड़न और मारपीट के एक बहुचर्चित मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने भीनमाल निवासी विवाहिता द्वारा दर्ज कराए गए मुकदमे को झूठा मानते हुए आरोपी पति और सास को दोषमुक्त कर दिया है।

मजिस्ट्रेट चंदन भाटी ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के विरुद्ध आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में पूरी तरह असफल रहा है।

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2013 से शुरू हुआ था कानूनी 'वनवास'

इस मामले की शुरुआत साल 2013 में हुई थी, जब भीनमाल निवासी एक महिला ने जोधपुर के रातानाडा निवासी अपने पति और सास के विरुद्ध महिला थाना (पश्चिम) में रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

  • गंभीर आरोप: महिला ने आरोप लगाया था कि विवाह के बाद से ही उसे कार, 11 लाख रुपये नकद और सोने के आभूषणों की मांग को लेकर शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है।
  • स्त्रीधन हड़पने का दावा: रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि ससुराल पक्ष ने उसका स्त्रीधन हड़प लिया है और उसके साथ मारपीट की गई है।

बयानों के विरोधाभास ने पलट दी बाजी

अदालत में सुनवाई के दौरान मामला तब पलट गया जब परिवादिया और उसके परिजनों के बयानों की जिरह शुरू हुई।

  • झूठ की परतें: महिला ने अपनी मुख्य रिपोर्ट में आरोप लगाया था कि प्रताड़ना विवाह के तुरंत बाद से ही शुरू हो गई थी।
  • सच्चाई का सामना: हालांकि, जिरह के दौरान उसने खुद स्वीकार किया कि बेटी के जन्म तक ससुराल पक्ष का व्यवहार उसके प्रति बिल्कुल सामान्य और अच्छा था।
  • अदालत का तर्क: मजिस्ट्रेट ने माना कि जब व्यवहार बेटी के जन्म तक सामान्य था, तो विवाह के तुरंत बाद से प्रताड़ना के आरोप निराधार और गंभीर विरोधाभास पैदा करने वाले हैं।

'संदेह का लाभ' देकर किया दोषमुक्त

अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में तालमेल की कमी थी। कोर्ट ने आरोपी पति और सास को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए (दहेज प्रताड़ना), 406 (अमानत में खयानत/स्त्रीधन) और 323 (मारपीट) के आरोपों से 'संदेह का लाभ' देते हुए बरी कर दिया। बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता हेमन्त बावेजा ने पैरवी की और सबूतों के अभाव को कोर्ट के सामने रखा।

समाज के लिए एक बड़ा संदेश

यह फैसला उन लोगों के लिए एक चेतावनी है जो आपसी विवादों को सुलझाने के बजाय सख्त कानूनों का सहारा लेकर झूठे मुकदमे दर्ज करवाते हैं। 13 साल तक चले इस ट्रायल ने न केवल आरोपियों का समय बर्बाद किया, बल्कि उन्हें मानसिक और सामाजिक पीड़ा भी दी। जोधपुर कोर्ट का यह निर्णय "न्याय में देरी, न्याय की मनाही है" की कहावत को चरितार्थ करता है, लेकिन अंततः सत्य की जीत हुई।

झूठे मुकदमों पर राजस्थान पुलिस की सतर्कता

हाल के वर्षों में राजस्थान में 498ए के मामलों में एफआर (Final Report/झूठा मामला) लगने की दर में बढ़ोतरी हुई है। राजस्थान पुलिस और न्यायपालिका अब ऐसे मामलों में बेहद बारीकी से जांच कर रही है ताकि निर्दोषों को सजा न हो।

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Published on:
17 Mar 2026 11:47 am
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