जोधपुर

जोधपुर के चांदपोल स्थित 200 साल पुराने मंदिर में जहां ऊंट पर विराजित है उष्ट्रवाहिनी माता

पुष्करणा ब्राह्मणों की कुलदेवी उष्ट्रवाहिनी का 200 वर्ष प्राचीन मंदिर चांदपोल दरवाजे के बाहर है जिसमें देवी उष्ट्रवाहिनी ऊंट पर विराजित है। मंदिर के गर्भगृह में दो दैवीय मूर्तियां स्थापित है। एक देवी उष्ट्रवाहिनी तो दूसरी आद्य शक्ति हिंगलाज माता की है। दोनों ही मूर्तियां चार भुजाधारी है और तीन हाथों में त्रिशूल, तलवार और गदा और एक हाथ में गोटा है।
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maa ushtravahini temple at chandpole area of jodhpur
जोधपुर के चांदपोल स्थित 200 साल पुराने मंदिर में जहां ऊंट पर विराजित है उष्ट्रवाहिनी माता

जोधपुर. पुष्करणा ब्राह्मणों की कुलदेवी उष्ट्रवाहिनी का 200 वर्ष प्राचीन मंदिर चांदपोल दरवाजे के बाहर है जिसमें देवी उष्ट्रवाहिनी ऊंट पर विराजित है। मंदिर के गर्भगृह में दो दैवीय मूर्तियां स्थापित है। एक देवी उष्ट्रवाहिनी तो दूसरी आद्य शक्ति हिंगलाज माता की है। दोनों ही मूर्तियां चार भुजाधारी है और तीन हाथों में त्रिशूल, तलवार और गदा और एक हाथ में गोटा है। मूर्ति के नीचे एक लेख उत्कीर्ण है जिसमें कहा गया है कि जमनादास व्यास और हर्ष नवलराय ने मूर्ति को तैयार करवाने के बाद विधिवत प्रतिष्ठित करवाया था।

लेख में प्रयुक्त तिथि विक्रम संवत 1877 के भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी सोमवार का उल्लेख है। देवी हिंगलाज की प्रतिमा पर भी एक उत्कीर्ण लेख में विक्रम संवत 1977 अंकित है। दोनों लेखों से यह ज्ञात होता है कि दोनों मूर्तियां अलग-अलग समय में तैयार होकर एक साथ प्रतिष्ठित की गई है। यह भी कहा जाता है कि मूर्तियां पहले जोधपुर भीतरी शहर के नवचौकियां मोहल्ले की बगेची में पधराई गई थी। संभवत: कालान्तर में विक्रम संवत 1877 याने सन 1820 में चांदपोल के बाहर वर्तमान मंदिर में दोनों मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की गई है।

प्रतिमाओं के बीच लेख से सिद्ध होता है कि देवी उष्ट्रवाहिनी का मंदिर विक्रम संवत 1877 तदनुसार सन 1820 में महाराजा मानसिंह के राज्यकाल में बनवाया गया होगा। देवी उष्ट्रवाहिनी माता के खीर, खाजा, लापसी और मालपुए का ही भोग चढ़ाया जाता है। नवरात्र में विशेष पूजन किया जाता है। मंदिर प्रांगण में संकट हरण हनुमान मंदिर और काशी विश्वनाथ मंदिर भी है।

Published on:
06 Oct 2019 04:04 pm