
गजेंद्र सिंह दहियाजोधपुर. मणिपुर में दो महिलाओं के कपड़े उतारकर सरेराह घूमाने का वीडियो वायरल होने के बाद पूरा देश शर्मसार है जबकि देश की महिलाओं ने ही आज ही के दिन 1947 में देश को कपड़े से बना राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा सौंपा था।
संविधान सभा की मुंम्बई से सदस्य हंसा मेहता ने सभा के अध्यक्ष व बाद में देश के प्रथम राष्ट्रपति बने डॉ राजेंद्र प्रसाद को 14 अगस्त को अपने हाथों से तिरंगा दिया। हंसा ने सरोजनी नायडू, विजयलक्ष्मी पंडित, दुर्गाबाई देशमुख, राजकुमारी अमृत कौर सहित 100 महिलाओं के नाम से यह तिरंगा प्रदान किय था। इन सभी 100 महिलाओं के नाम संविधान में दर्ज है। यही तिरंगा अगले दिन 15 अगस्त 1947 को लाल किले की प्राचीर से लहराया गया और देश दो सौ साल बाद अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुआ।
कोई मतदान नहीं, खड़े होकर दी स्वीकारोक्ति
पंडित जवाहरलाल नेहरु ने 22 जुलाई को तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार करने का प्रस्ताव संविधान सभा में रखा। अति महत्वपूर्ण विषय होने की वजह से संविधान सभा के सदस्यों ने उसी दिन बगैर किसी वोटिंग के प्रस्ताव ध्वनिमत से पास किया। प्रस्ताव पास होने के समय सभी सदस्य तिरंगे के सम्मान में आधा मिनट खड़े रहे।
3 संशोधन आए आए, किसी ने नहीं रखा
राष्ट्रीय ध्वज प्रस्ताव पर तीन संशोधन की सूचना आई, लेकिन सदस्यों ने कहा कि नहीं रखना चाहिए। एचवी कामथ ने स्वास्तिक और सत्यम, शिवम् व सुन्दरम् जोड़ने की बात भी कही, लेकिन संशोधन वापस ले लिया।
20 साल से घर-घर लहरा रहा तिरंगा
पहले केवल 15 अगस्त अथवा 26 जनवरी को झंडा फहरा सकते थे। वर्ष 2002 में नवीन जिंदल बनाम भारत संघ के निर्णय के बाद यह 365 दिन 24 घंटे लगाया जा सकता है। यह हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भाग है।
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आजादी में महिलाओं के अपूर्व योगदान के कारण देश को राष्ट्रीय ध्वज सौंपने का गौरव भी महिलाओं को प्राप्त है।
डॉ दिनेश गहलोत, संविधान विशेषज्ञ, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर