
जोधपुर. राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एनएलयू) जोधपुर सहित अन्य एनएलयू के पूर्व व वर्तमान छात्रों की ओर से देशभर में न्यूज वेबसाइट पर किए गए एक अध्ययन में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। इसके मुताबिक एक तिहाई न्यूज वेबसाइट पर भ्रामक सामग्री है। इतनी ही वेबसाइट ने अपने संचालन और कमाई के स्त्रोत को लेकर भी खुलासा नहीं किया है। शोध में यह भी सामने आया है अखबार व न्यूज चैनल की वेबसाइट की तुलना में स्वतंत्र वेबसाइट पर कंटेंट कोई खास अलग नहीं था। दूसरे शब्दों में कहें तो समाचार पत्र की विश्वसनीयता बरकरार है।
यह शोध इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के 56 फीसदी युवा (35 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति) न्यूज के लिए न्यूज वेबसाइट का इस्तेमाल करते हैं। 26 फीसदी टेलीविजन और 16 फीसदी समाचार पत्रों के माध्यम से समाचार प्राप्त करते हैं। यह अध्ययन यूके स्थित ग्लोबल डिसइफॉर्मेशन इंडेक्स और भारत की सेंटर फॉर इंटरनेट एण्ड सोसायटी के बैनर तले तोर्शा सरकार, प्रणव एम बिदारे, गुरशाबाद ग्रोवर व मेघा मिश्रा ने किया। राजेश रंजन, प्रिया जैन और कुन्दन कुमार चौधरी का सहयोग रहा।
56 वेबसाइट का तीन मानकों पर अध्ययन
- अध्ययन के लिए देशभर की हिंदी, अंग्रेजी व बांग्ला भाषा की 56 वेबसाइट को चुना गया। जिनका अध्ययन सामग्री, संचालन और संदर्भ के तीन मानकों पर किया गया।
- न्यूनतम जोखिम स्तर के लिए 0 और उच्चतम जोखिम स्तर के लिए 100 अंक निर्धारित थे।
- 56 में से 18 वेबसाइट पर अधिकतम जोखिम स्तर मिला। इसमें दुष्प्रचार सामग्री अधिक थी जो समाज के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक पहलुओं पर गलत प्रभाव डालती है।
- वैसे न्यूनतम जोखिम स्तर और उच्चतम जोखिम स्तर की एक भी वेबसाइट नहीं मिली।
- इसमें से केवल 8 वेबसाइट का दुष्प्रचार स्तर निम्न मिला।
- इसमें से 7 ने अपनी सामग्री हिंदी और अंग्रेजी में प्रकाशित कर रखी थी।
- कमाई के स्त्रोत को लेकर एक तिहाई वेबसाइट मौन हैं।
- केवल 10 वेबसाइट उन नीतियों के बारे में स्पष्ट है कि वे कैसे अपनी रिपोर्टिंग में हुई त्रुटियों को ठीक करती हैं।
रिपोर्ट का निष्कर्ष
भारतीय मीडिया वेबसाइट संचालन, नियंत्रण एवं संतुलन की कमियों को दूर करने के उपाय शुरू करते हैं तो इनकी विश्वसनीयता में काफी वृद्धि हो सकती है।