- मंडोर खुला बंदी शिविर बदल रहा जीने का सलीका
- 35 कैदियों को अपने परिवार के साथ रहने की स्वीकृति मिलती है
जोधपुर. अपराध कर सजा पाने वाले कैदी समाज की मुख्य धारा से दूर हो जाते हैं। समाज में हीन भावना और तिरस्कार भी झेलते हैं। लेकिन मंडोर क्षेत्र में खुला बंदी शिविर ऐसे ही सजा काट रहे कैदियों को समाज की मुख्य धारा में लाने का प्रयास कर रहा है। परिवार के साथ रहने का सुख और सजा काटने के बाद जीवन जीने का लक्ष्य भी देता है। यहां 35 कैदी अपने परिवार के साथ उन्नत कृषि की विधाएं सीख रहे हैं।
मजदूर के रूप में काम कर सीख रहे कृषि विधाएं
यहां कैदियों को कृषि अनुसंधान केन्द्र में श्रमिक के तौर पर काम करवाया जाता है। यह उनकी सजा में शामिल है। कृषि की उन्नत विधाओं और लगातार कृषि कार्य करने से अपनी सजा पूरी करने के बाद कैदियों को खेती के तौर पर अपना जीवन यापन करने में भी मदद मिलती है।
सुबह शाम होती है हाजरी
खुला बंदी शिविर में सुबह शाम हाजरी होती है। कैदियों और उनके परिजनों को रात को रहना भी वहीं होता है। यदि हाजरी में कोई उपस्थित नहीं रहता है तो उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई जाती है। ऐसे कई मामले अमूमन सामने आते रहते हैं जब खुला बंदी शिविर से कैदी गायब हो जाते हैं।
जेल में अच्छा व्यवहार
कुछ संगीन अपराधों को छोड़ कर जेल में अन्य अपराधों की सजा काट रहे कैदी का व्यवहार अच्छा होता है तो अपनी सजा अवधि का एक तिहाई बंद जेल में काटने के बाद उसे खुला बंदी गृह में स्थानांतरित किया जा सकता है। खुला बंदी शिविरों में सीमित स्थान के कारण कई बार 8 साल की सजा काटने के बाद ही इन जेलों में रहने के लिए स्थान मिल पाता है।
घुटन के बाद खुला वातावरण
बंद जेल के घुटन भरे वातावरण से बेहतर यह खुली जेल ताजी हवा उपलब्ध करवाती है। यदि बंद जेल में कैदी का व्यवहार अच्छा होता है और लम्बी अवधि की सजा काट चुका होता है तो उसे खुली जेल में शिफ्ट किया जाता है। 5 साल से अधिक सजा काटने वाले बंदियों को इसमें शिफ्ट किया जाता है।
इनका कहना
खुला बंदी शिविर में परिवार के साथ 35 परिवारों को रखा जा रहा है। यहां काम कर यह लोग समाज की मुख्य धारा में लौटने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे लोग जो कि अच्छा व्यवहार करते हैं और लम्बी सजा काट चुके होते हैं उनको प्राथमिकता दी जाती है।
विक्रमसिंह कर्णावट, उप महानिरीक्षक जेल