जोधपुर

जानिए कैसे जोधपुर से होता है देश का बाजरा पास और फेल

परीक्षण में खरा उतरने पर ही किस्म को विकसित किया जाता है और किसानों को बोने के लिए उपलब्ध कराया जाता है।
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Updated: 20 Nov 2017, 5:23 PM IST
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जोधपुर। देश में खाए जाने वाले बाजरा पास और फेल जोधपुर से होता है। जी हां, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की ओर से वित्तपोषित अखिल भारतीय समन्वित बाजरा अनुसंधान परियोजना जोधपुर में कार्यरत है। वर्तमान में यह केन्द्र मण्डोर स्थित कृषि विश्वविद्यालय परिसर में चल रहा है। इसके तहत पूरे देश में सरकारी व निजी कंपनियों को बाजरा की किस्मों को विकसित करने से पहले यहां परीक्षण करवाना होता है। परीक्षण में खरा उतरने पर ही किस्म को विकसित किया जाता है और किसानों को बोने के लिए उपलब्ध कराया जाता है।

ऐसे मिली जोधपुर को जिम्मेदारी


देश में बाजरा का क्षेत्रफल सर्वाधिक अर्थात करीब 50 लाख हैक्टेयर क्षेत्र राजस्थान में होने के कारण जोधपुर को करीब 22 वर्ष पूर्व वर्ष 1995-96 में यह जिम्मेदारी मिली। इससे प्रदेश सहित पूरे देश में बोए जाने वाले बाजरा का परीक्षण होने लगा। नई किस्मों (संकर व संकुल) किस्में विकसित होने लगी और किसानों को अनुमोदन करवाया जाने लगा। पूर्व में यह परियोजना पूना में थी। पूरे देश में बाजरे का करीब 70.90 लाख हैक्टेयर क्षेत्र है।

190 किस्में पास


परियोजना के अंतर्गत देश की अलग.अलग सरकारी व निजी कंपनियों से प्राप्त बाजरा की किस्मों का परीक्षण किया जा रहा है। अब तक 3200 किस्मों का परीक्षण किया गया। इसमें से 190 उत्कृष्ट पाई गई, शेष का परिणाम संतोषजनक नहीं रहा। परीक्षण के दौरान पुष्प आने का समय, पकने का समयए पौधों की लंबाई, सिट्टे की लंबाई-मोटाई, दाने व सूखे चारे की उपज, बीमारी व कीड़ों की सहनशीलता के मापदण्ड, दाने का आकार-वजन आदि का परीक्षण किया जाता है।

परीक्षण 3 भागों में


देश की कृषि जलवायु खण्ड़ों के अनुसार बाजरा उत्पादक राज्यों को तीन अलग-अलग भागों में विभाजित किया गया है। इसके अनुसार पहले भाग में उत्तर भारत के राज्यों में राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दिल्ली शामिल है। दूसरे भाग में दक्षिण भारत के राज्यों में तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना व कर्नाटक शामिल है। तीसरे भाग में बहुत कम वर्षा (400 एमएम से कम वर्षा) व शुष्क क्षेत्रों में पश्चिमी राजस्थान व हरियाणा व गुजरात के कम वर्षा वाले क्षेत्र शामिल है।

3 वर्ष तक परीक्षण, 15 साल का कार्यकाल


परियोजना के जोधपुर स्थित केन्द्र पर देशभर की सरकारी व निजी कंपनियां बाजरा के विभिन्न किस्म के सेंपल भेजते हैं। केन्द्र में बीज का नाम छुपाकर कोडिंग कर केन्द्र के अंतर्गत कार्य कर रहे देशभर में सरकारी व निजी सहित करीब 60 केन्द्रों पर परीक्षण के लिए भेजा जाता है। जहां पर तीन वर्षो के आधार पर सेंपल का परीक्षण किया जाता हैए परीक्षण में सेपल के सफल होने पर केन्द्र पर समीक्षा की जाती है। बाद में, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की ओर से गठित सेन्ट्रल वैरायटी रिलीज कमेटी (सीवीआरसी) की बैठक में उक्त सफल किस्म का अनुमोदन कर केन्द्र सरकार के समक्ष अनुशंषा के लिए भेजी जाती है। केन्द्र सरकार का अनुमोदन मिलते ही किस्म को विकसित करने के लिए किसानों को उपलब्ध कराया जाता है। एक किस्म का कार्यकाल 15 वर्ष का होता है।

लोकप्रिय किस्में


एमपी-एमएस 17, एमपी-एमएस 21, आरएचडी 173 आदि लोकप्रिय किस्में विकसित की गई। जिनके अच्छे परिणाम आए है। ये उच्च तापमान सहन करने वालीए शुष्क जलवायु क्षेत्रों के लिए अच्छी है।

सतत् कार्य जारी है परियोजना


केन्द्र पर देशभर की बाजरा की किस्मों का सतत् परीक्षण कार्य जारी है। जोधपुर को जिम्मेदारी मिलने के बाद बाजरा की विभिन्न किस्मों पर अनेक परीक्षण हुए। नई तकनीकों के साथ कार्य कर कई नई किस्में तैयार की गई। परिणामस्वरूप क्षेत्रफल बढ़ा है।


-प्रो बलवंतसिंह राजपुरोहित बाजरा प्रजनक, उत्पादन व आनुवांशिकी, एमपी-एमएस 17, 21 आदि किस्में विकसित करने वाले प्रजनक

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