
जोधपुर,रेत को भी समझ लिया पानी,हाय क्या चीज़ प्यास होती है, जैसे शेर कहने वाले शहर के बुजुर्ग शाइर सिकंदर शाह खुशदिल का शनिवार को इंतकाल हो गया। वे 78 वर्ष के थे। खुशदिल लंबे समय से बीमार थे। उनका जन्म 24 जुलाई 1930 को हुआ था। उन्हें शनिवार को ही जोधपुर के सिवांची गेट स्थित कब्रिस्तान में सुपुर्दे-खाक कर दिया गया। उनकी अंतिम यात्रा में कई साहित्यकारों ने शिरकत की। उनके काव्य संग्रह नज़रियाते खुशदिल,नुकूशे खुशदिल, खय़ाबाने खुशदिल और आते जाते सांस नाम से प्रकाशित हुए थे।
तीन तखल्लुस रखे
मशहूर शाइर शीन काफ निजाम साहब ने राजस्थान उर्दू अकादमी से प्रकाशित मआसिर शौअरा-ए-जोधपुर (जोधपुर के सर्वकालिक शाइर) पुस्तक में लिखा है-नाम सिकन्दर शाह खुशदिल। आरिफ शाह के बेटे। वो 24 जुलाई 1930 को जोधपुर में पैदा हुए। दादा मोहम्मद साबिर शाह फारसी में शेर कहते थे और अफसर तखल्लुस करते थे। पिता आरिफ शाह भी कभी कभी शेर कहते थे। उने पिता शेरो शाइरी के अलावा हिकमत यानी यूनानी चिकित्सा पद्धति के चिकित्सक भी थे। प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। सतरह बरस की उम्र में शाइरी का आगाज किया। खुशदिल साहब फरमाते हैं :
'पहले मेरा तखल्लुस जाहिल था, उसके बाद मैंने तखल्लुस सफदर इख्तियार किया और अमजद जोधपुरी की शागिर्दी इख्तियार की, यह सिलसिला 1947 से 1950 तक रहा, सफदर के बाद मैंने अपना तखल्लुस खुशदिल किया। सन 1954 से 1956 तक मैं नागौर में शिक्षक रहा, वहां मैं रौनक साहब नागौरी का शागिर्द हुआ।
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तीन काव्य संग्रह
मशहूर शाइर शीन काफ निजाम ने पुस्तक में लिखा है कि शिक्षा विभाग की ओर से होने वाले हैंडलूम की ट्रेनिंग में जब खुशदिल साहब उदयपुर गए तो वहां उनकी मुलाकात दानिश टोंकी से हुई, एक साल तक उनकी शागिर्दी इख्तियार की। दानिश साहब ने उन्हें इल्मे उरूज यानी उर्दू छंद शास्त्र से अवगत करवाया। उनके तीन काव्य संग्रह नजरियाते-खुशदिल, नुकूशे -खुशदिल और खयाबाने खुशदिल के नाम से देवनागरी लिपि में प्रकाशित हो चुके हैं। जोधपुर स्टेट रेडियो से भी उनका कलाम प्रसारित हुआ है। खुशदिल साहब की शाइरी अपनी ही तरह की शाइरी है।
उनके शेर देखें :
कुल जमाना ही सो गया जैसे,
इस तरह उनको नींद आई है
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मिरी कमजोरियों का हाल इस दर्जा को पहुंचना है
ख्याले-दर्द से भी दर्द होता है मिरे दिल में
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जान दी मैंने सजावट के लिए
कब लहू का रंग कपड़ों से मिला
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सुनसान मेरा दिल है बिखरी है बात मेरी
जंगल में जैसे कोई टूटी सी झौंपड़ी है
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बस गम ही गम मिले हैं हमें गम ही गम मिले
इतने बड़े जहां में उन्हें एक हम मिले
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फिर देखना हवा में धनक बन रहा है क्या?
आंचल किसी का उड़ता हुआ आ गया न हो
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