
जोधपुर. राजस्थान हाईकोर्ट की वृहद पीठ ने अभिनिर्धारित किया है कि यदि कोई बंदी पैरोल की अवधि समाप्त होने के बाद जेल प्राधिकारी के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं करता है तो यह माना जाएगा कि ऐसा कानूनी हिरासत से बचने के लिए किया गया है। इसलिए ऐसे बंदी आमतौर पर नियमों में निहित निषेध के कारण ओपन एयर कैंप में स्थानांतरित करने के हकदार नहीं होंगे।
दो खंडपीठों के मत में भिन्नता को देखते हुए विधि का प्रश्न अभिनिर्धारित करने के लिए मुख्य न्यायाधीश ने न्यायाधीश विजय बिश्नोई, न्यायाधीश पुष्पेंद्र सिंह भाटी तथा न्यायाधीश विनित कुमार माथुर की वृहद पीठ का गठन किया था। पिछले साल 6 अक्टूबर को योगेश कुमार मामले में एक खंडपीठ ने कहा था कि पैरोल की अवधि पूरी होने के बाद भी जेल में रिपोर्ट नहीं करने वाले कैदी की तुलना उन कैदियों से नहीं की जा सकती, जो जेलों से भाग गए हैं या जिन्होंने ऐसा करने का प्रयास किया है। जबकि दूसरी खंडपीठ ने इस मत से सहमति नहीं जताते हुए मामला वृहद पीठ के अभिनिर्धारण के लिए भेज दिया था। वृहद पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि सुधार और पुनर्वास के सुनहरे सिद्धांत के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए पैरोल का उद्देश्य कैदी को रिहा करना है, ताकि उसे समाज से जुडऩे में सक्षम बनाया जा सके। सुधार और पुनर्वास के सभी सामाजिक उद्देश्य धुल जाएंगे या निश्चित रूप से कमजोर हो जाएंगे, यदि पैरोल के अनुशासन को बार-बार उल्लंघन के साथ कलंकित किया जाता है।