राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय में अब मंत्रों के माध्यम से बीमारियों के इलाज की पहल की जा रही है। इसके तहत विश्वविद्यालय में मंत्र चिकित्सा केंद्र खोला जाएगा। विवि अस्पताल में भर्ती मरीजों पर मंत्र चिकित्सा के क्लीनिकल ट्रायल किए जाएंगे, ताकि इसके प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन किया जा सके।
जोधपुर: डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय में चिकित्सा मंत्रों पर शोध किया जाएगा। आयुर्वेद संहिता, वैदिक ऋचाओं और महाभारत में बीमारियों के इलाज के लिए 100 से अधिक मंत्रों का उल्लेख है।
इन मंत्रों का संकलन करके बीमारी के अनुसार मरीज पर विवि के हॉस्पिटल में ही क्लीनिकल ट्रायल होगा। विवि आईआईटी जोधपुर की भी मदद लेगा, जिससे मंत्रों की विभिन्न उपादेयता को वैज्ञानिक प्रमाण मिल सके।
आयुर्वेद में तीन चिकित्सा पद्धति होती है। पहली युक्ति व्यपाश्रय है, जिसमें पंचकर्म, शल्यकर्म, दवाइयां देना जैसी चिकित्सा है। दूसरी पद्धति देव व्यपाश्रय है, जिसमें मंत्र चिकित्सा, उपवास, ध्वनि थैरेपी, अनुष्ठान, होम, दान देना, धूप चिकित्सा सहित 12 प्रकल्प हैं।
तीसरी पद्धति सत्वावजय है, जिसमें मन को संकेंद्रित करके चिकित्सा होती है। विवि ने दूसरी पद्धति में मंत्र और उपवास को प्रयोग के लिए चुना है। विवि की ओर से विशेषज्ञों की मदद से मंत्र चिकित्सा की एसओपी तैयार करके मंत्र चिकित्सा केंद्र की स्थापना की जाएगी।
आयुर्वेद विवि ने गत दिनों अपने हॉस्पिटल में मरीजों पर रात्रिसूक्तम मंत्र का छह मरीजों पर क्लीनिकल ट्रायल किया था। ट्रायल के दौरान आशाजनक परिणाम मिलने से विवि को अब सभी मंत्रों का संकलन करके उन पर शोध करने का मानस बनाया है।
आयुर्वेद में विभिन्न बीमारियों के लिए विभिन्न मंत्र सुझाए गए हैं। मसलन मनोविकार बुद्धि के लिए मेधासूक्तम है। डर के मारे बुखार आने पर ज्वर शमन मंत्र का उपयोग किया जाता है। इस तरह कैंसर, डायबिटीज और ह्रदय रोग के लिए भी विभिन्न मंत्र है।
हम मंत्र चिकित्सा पर विशेष व्याख्यान, कार्यशालाएं करवाकर इसकी एसओपी तैयार करेंगे, जिससे मंत्र चिकित्सा केंद्र स्थापित हो सकेगा। हॉस्पिटल में क्लीनिकल ट्रायल किया जाएगा। आईआईटी के साथ हमारा एमओयू है।
-प्रो. गोविंद सहाय शुक्ल, कुलगुरु, आयुर्वेद विश्वविद्यालय, जोधपुर
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय में रसायनशाला के व्यवसायीकरण को लेकर सोमवार को अहम बैठक हुई। बैठक की अध्यक्षता कुलगुरु प्रो. गोविंद सहाय शुक्ल ने की। इसमें रसायनशाला के बाह्य विशेषज्ञ डॉ. त्रिलोक चंद सहित संबंधित विभागों के अधिकारी उपस्थित रहे।
बैठक में रसायनशाला में उपलब्ध मशीनों, उपकरणों और संसाधनों की समीक्षा की गई तथा व्यवसायीकरण के लिए आवश्यक अतिरिक्त मशीनरी, भवन विस्तार और मानव संसाधन पर चर्चा हुई। कुलगुरु ने कहा कि यह पहल विश्वविद्यालय को आत्मनिर्भर बनाने के साथ आय का स्थायी स्रोत विकसित करेगी और आमजन को प्रमाणित, गुणवत्तापूर्ण आयुर्वेदिक औषधियां उपलब्ध होंगी।
प्रारंभिक चरण में चूर्ण, वटी, सीरप, अवलेह, तेल के साथ कॉस्मेटिक और न्यूट्रास्यूटिकल उत्पादों के निर्माण-विपणन पर सहमति बनी। लाइसेंसिंग नवीनीकरण, गुणवत्ता परीक्षण और स्टेबिलिटी जांच मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं से कराने का निर्णय लिया गया। लागत और बजट सहित विस्तृत प्रस्ताव आगामी वित्त समिति की बैठक में प्रस्तुत किया जाएगा।