राजस्थान हाईकोर्ट ने 16 वर्षीय बलात्कार पीड़िता को 27 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी। कोर्ट ने पॉक्सो मामलों में देरी रोकने के लिए राज्यभर में एसओपी बनाने के निर्देश दिए। इलाज और देखभाल का पूरा खर्च सरकार उठाएगी।
Rajasthan High Court: जोधपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने एक 16 वर्षीय बलात्कार पीड़िता की 27 सप्ताह की गर्भावस्था के चिकित्सकीय समापन की अनुमति दी है। साथ ही कोर्ट ने पॉक्सो मामलों में गर्भावस्था की जांच और समापन में देरी के कारण पीड़िताओं को होने वाले मानसिक आघात पर संज्ञान लेते हुए भविष्य में ऐसी देरी न हो, इसके लिए राज्य भर में एक स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) बनाने पर जोर दिया है।
न्यायाधीश मुकेश राजपुरोहित की एकलपीठ में पीड़िता की ओर से अधिवक्ता सपना वैष्णव ने कहा कि बलात्कार के कारण हुई इस अवांछित गर्भावस्था को जारी रखना नाबालिग के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। पीठ ने एसएन मेडिकल कॉलेज, जोधपुर के चिकित्सकीय बोर्ड की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के हाल के उन निर्देशों को गंभीरता से लिया, जिनमें प्रजनन स्वायत्तता और शारीरिक अखंडता को अनुच्छेद-21 का हिस्सा माना गया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि किसी नाबालिग बलात्कार पीड़िता को केवल इसलिए गर्भधारण करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। क्योंकि वह कानूनी समय सीमा 20 सप्ताह पार कर चुकी है। एकलपीठ ने मेडिकल कॉलेज को तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम गठित कर सुरक्षित प्रक्रिया अपनाने का आदेश दिया है। राज्य सरकार को पीड़िता के इलाज, आईसीयू, रक्ताधान, पोस्ट-ऑपरेटिव केयर और उसके परिवार के आवागमन व रहने के सभी खर्च वहन करने का निर्देश दिया गया है।
साथ ही फॉरेंसिक जांच के लिए भ्रूण के ऊतकों को संरक्षित रखने के भी आदेश दिए गए हैं। कोर्ट ने अब एसओपी पर विचार के लिए मामले को जुलाई के प्रथम सप्ताह में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। इधर, जिला कलेक्टर आलोक रंजन ने हाईकोर्ट के आदेश की पालना सुनिश्चित करने के लिए मुख्य चिकित्सा व स्वास्थ्य अधिकारी को नोडल अधिकारी नियुक्त किया है।
राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस सुदेश बंसल की एकलपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए 13 वर्षीय नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता को 28 सप्ताह की गर्भावस्था के समापन (अबॉर्शन) की अनुमति दी थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पीड़िता को बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर किया गया, तो उसे जीवनभर गंभीर मानसिक और शारीरिक पीड़ा झेलनी पड़ेगी।
चिकित्सीय बोर्ड ने इस प्रक्रिया को 'हाई-रिस्क जोन' में बताया था, इसके बावजूद कोर्ट ने पीड़िता के माता-पिता की सहमति और उसके स्वास्थ्य को सर्वोपरि रखते हुए यह मानवीय आदेश जारी किया।
राजधानी जयपुर के सांगानेर महिला चिकित्सालय की अधीक्षक को सुरक्षित गर्भपात की व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए थे। इलाज का खर्च राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को उठाने के लिए कहा गया था।
यदि गर्भपात के दौरान भ्रूण जीवित पाया जाता है, तो उसके पालन-पोषण की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी। भ्रूण मृत होने की स्थिति में डीएनए सैंपल सुरक्षित रखा जाएगा।
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट के तहत विशेष मामलों में 24 सप्ताह तक ही गर्भपात की अनुमति है। इससे अधिक समय होने पर केवल कोर्ट की मंजूरी और मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर ही अबॉर्शन किया जा सकता है।