जोधपुर

40 साल के जीवन में पहली बार ऐसे दिन देखने को मिल रहे कि में भी नहीं बिक रहे बाबा के घोड़े

- सालों से बना रहे बाबा के घोड़े परिवारों की व्यथा- कहां कोरोना ने तो मार ही डाला, आमदानी नहीं हो रही, बच्चे भीख मांगने को मजबूर    
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Aug 23, 2020
40 साल के जीवन में पहली बार ऐसे दिन देखने को मिल रहे कि में भी नहीं बिक रहे बाबा के घोड़े
40 साल के जीवन में पहली बार ऐसे दिन देखने को मिल रहे कि में भी नहीं बिक रहे बाबा के घोड़े

जोधपुर. पिता, दादा बाबा रामदेव के घोड़े बनाते आ रहे है उनसे ही हमने यह हुनर सीखा। लेकिन इस बार तो मानो कोरोना ने हमें मार ही डाला। 40 साल से ज्यादा की उम्र हो गई है। पहली बार ऐसे दिन देखने को मिल रहे है कि माह में भी बाबा के लिए बनाए घोड़े नहीं बिक रहे। ऐसे में घर खर्च चलाने में भी दिक्कतों का सामाना करना पड़ रहा है। स्थानीय प्रशासन भी हम गरीबों पर ध्यान नहीं दे रही। परिवार का पेट पालना तक मुशिकल हो गया। यह व्यथा है शहर के प्रतापनगर दीनदयाल पार्क के बाहर झोपड़ी बनाकर रहने वाले नवरंग भाट व भरत भाट की।

नवरंग भाट ने बताया कि वह पिछले 25 वर्षों से अधिक समय से बाबा के घोड़े, कठपुतलियां, लकड़ी की मूर्तियां बनाकर परिवार का गुजारा करते आ रहे है। लेकिन इस बार हालत यह है कि कोरोना के चलते न तो बाबा के घोड़े खरीदने के लिए जातरू आ रहे है उन लकड़ी से बनी प्रतिमाएं खरीदने कोई आ रहा है। भरत भाट ने बताय कि रुपए लगाकर 15-20 अलग-अलग साइज के बाबा के घोड़े बनाए लेकिन उनमें से अभी पांच भी नहीं बिके।

101 से 10 हजार तक का घोड़ा
नवरंग भाट ने बताया कि गत वर्ष 60 से अधिक घोड़े ***** माह में बेचे थे। इस बार पांच भी नहीं बिके। 101 रुपए से लेकर 10 हजार रुपए तक के घोड़े है। उन्होंने बताया कि घास, रूई, प्लास्टिक रस्सी, कपड़े से बाबा के घोड़े अलग-अलग साइज में बनाते है।

बच्चे भीख मांगने को मजबुर
नवरंग भाट ने बताया कि कम पढ़े लिख है इसलिए कोई दूसरा काम भी नहीं कर पाते। घर चलाने के लिए ढोल बजाने, गली-गली घूमकर लकड़ी की मूर्तियां बेचने का काम भी करते है। जिससे कुछ आमदानी हो जाती है। उन्होंने कहा कि बताते हुए भी शर्म आती है कि आर्थिक तंगी के कारण हमारे बच्चे चौराहों पर भीख तक मांगते है।

Published on:
23 Aug 2020 12:00 am