
वरिष्ठ न्यायाधीश संगीत लोढ़ा तथा न्यायाधीश रामेश्वर व्यास की खंडपीठ में याचिकाकर्ता राजस्थान किसान संघर्ष समिति की ओर से अधिवक्ता कुलदीप माथुर और अंकुर माथुर ने कहा कि माही नदी मध्य प्रदेश से प्रतापगढ़ होते हुए बांसवाड़ा में आती है और यहीं से वो गुजरात में प्रवेश करती है। इस नदी के पानी के उपयोग को लेकर 10 जनवरी,1966 को एक समझौता हुआ, जिसके अनुसार यह तय हुआ था कि गुजरात को माही बांध से 40 टीएमसी पानी उपलब्ध करवाया जाएगा, जिसके बदले में गुजरात सरकार द्वारा बांध निर्माण में वित्तीय सहायता दी जाएगी। यह पानी गुजरात के खेड़ा जिले में सिंचाई के लिए उपलब्ध करवाया जाना था। समझौते के अनुसार जब खेड़ा जिले में नर्मदा का पानी आ जाएगा तब राज्य सरकार गुजरात की ओर से वहन किए गए खर्च को वापस कर देगी और यह पानी राजस्थान में ही उपयोग के लिए रहेगा। उन्होंने कहा कि इसी तरह कडाणा बांध में भी राजस्थान के साथ इकरार हुआ था, जिसमें कि पूरा पानी राजस्थान से ही जाता है। खेड़ा जिले में नर्मदा के पानी से सिंचाई शुरू हो चुकी हैं। गुजरात सरकार ने कडाणा से, सुजलम सुफलम नहरें बनाते हुए सिंचाई सुविधा का विस्तार कर दिया है। जबकि सिंचाई के लिए उपयोग में आने वाले पानी पर राजस्थान का हक है, लेकिन राज्य सरकार अपने अधिकारों को लेकर अपेक्षित कदम नहीं उठा रही। गुजरात सरकार ने नर्मदा व माही को इन्टर लाकिंग भी कर दिया है। उन्होंने कहा कि 40 टीएमसी माही व 28 टीएमसी पानी कडाणा के समझौते के अनुसार कुल 66 टीएमसी पानी राजस्थान राज्य का हिस्सा है। इसका राज्य में उपयोग नहीं कर पाने के चलते हर साल ओवरफ्लो पानी समुद्र में मिल जाता है। याचिका में राज्य के हिस्से के पानी का उपयोग करने के लिए विशेषज्ञों के अध्ययनों के आधार पर चार विकल्प सुझाए गए हैं। इन पर अमल करने से इस पानी का उपयोग जालोर-बाड़मेर सहित असिंचित क्षेत्रों में किया जा सकता है।