
जोधपुर। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) जोधपुर ने पानी में पारे की जांच के लिए नया सेंसर विकसित किया है। सेंसर 2 सेकंड में पारे की अति सूक्ष्म मात्रा भी बता देगा। एक गुणा एक सेंटीमीटर के आकार का यह डिवाइस जेब में रखकर कहीं भी ले जाया सकता है।
आइआइटी जोधपुर ने अमरीका की साउथ डेकोटा यूनिवर्सिटी और सिंगापुर की ए-स्टार कम्पनी के सहयोग से यह सेंसर विकसित किया है। इसके लिए पहली बार मॉलिब्डनम डाई सल्फाइड का उपयोग किया गया है। इसे एल्गेन-गैलियम नाइट्राइट के हाई इलेक्ट्रोन मोबिलिटी ट्रांजिस्टर के साथ संलग्न किया गया है। इस सेंसर को पानी में डालने पर इसके करंट में बदलाव होता है जो मापकर पानी में पारे की उपस्थिति का पता लगाया जा सकता है। यह डिवाइस इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. महेश कुमार और उनके शोधार्थी आदर्श निगम और नीरज गोयल ने विकसित की है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पानी में पारे की मात्रा 1 पीपीबी (पाट्र्स पर बिलियन) से अधिक नहीं होनी चाहिए। पारा अधिक होने पर तंत्रिका व श्वसन तंत्र पर दुष्प्रभाव और किडनी कैंसर का खतरा रहता है। देश में कई शहरों में औद्योगिक अपशिष्ट नदी-नालों में बहाए जाते हैं। इनमें पारा सहित कई भारी धातुएं होती है। पारा एक जहरीला तत्व है। घर में थर्मामीटर में क्रेक होने पर भी पारे की सूक्ष्म मात्रा शरीर में विष पहुंचा सकती है।
पारा विश्व के 10 खतरनाक रसायनों में
डब्ल्यूएचओ की विश्व के 10 खतरनाक रसायनों की सूची में पारा भी शामिल है। जापान के मिनामाता शहर में 1932 से 1968 के मध्य फैक्ट्रियों से निकले दूषित जल में पारे की अधिक मात्रा के कारण जलीय जीव संक्रमित हो गए और इन्हें भोजन के रूप में लेने वाले 50 हजार से अधिक लोग बीमार पड़े। करीब 2000 लोग मारे गए। तब से पारे से होने वाली बीमारी का नाम ही मिनामाता रख दिया गया।
अति संवदेनशील है डिवाइस
- हमनें पहली बार मोलिब्डनम डाई सल्फाइड का उपयोग करके अति संवेदशनील सेंसर बनाया है जो दो सेकंड में पानी में पारे की उपलब्धता बता देगा।
डॉ. महेश कुमार, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग, आइआइटी जोधपुर