जोधपुर

प्रसंगवश- मानसून के ही भरोसे रहना समझदारी नहीं

मानसून हर साल एक जैसा नहीं होता। इसलिए एक अच्छे मानसून की उम्मीद के भरोसे रहना समझदारी नहीं होगी। जलसंकट जब दरवाजे पर पहुंचता है, तब इंतजाम करने में देर हो चुकी होती है।
2 min read
• •
Oct 03, 2026
monsoon
प्रतीकात्मक तस्वीर

संदीप पुरोहित

आज की तैयारी, कल की परेशानियों को कम कर सकती है, लेकिन राजस्थान में जलसंकट के समाधान की दिशा में ऐसी तैयारी कभी होती नहीं दिखती। यही वजह है कि जल संसाधन विभाग के ताजा आंकड़े आसन्न जलसंकट को लेकर चिंता व्यक्त करने वाले हैं। मानसून की विदाई के पहले जारी ये आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश के 693 बांधों में पिछले साल की तुलना में भराव क्षमता के मुकाबले करीब 30 प्रतिशत कम पानी रहा है।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि जयपुर के रामगढ़ समेत 202 बांध ऐसे हैं, जहां इस मानसून में पानी पहुंचा ही नहीं। प्रदेश के शहरों में तो संकट आने पर टैंकर, पाइपलाइन और वैकल्पिक स्रोतों से राहत दी जा सकती है, लेकिन दूरदराज के गांवों, ढाणियों और रेगिस्तानी क्षेत्रों में पानी पहुंचाना अधिक कठिन चुनौती है। वहां कई बस्तियां आज भी सीमित जलस्रोतों पर निर्भर हैं। यह खतरा हमेशा रहता है कि गर्मी बढऩे के साथ यदि ये स्रोत कमजोर पड़े तो संकट तेजी से गहरा सकता है। सरकार को संकट आने का इंतजार नहीं करना चाहिए। पहले से उन जिलों और क्षेत्रों की पहचान जरूरी है, जहां बांधों और जलाशयों में पानी कम है।

गांववार पेयजल व सिंचाई के लिए पानी की जरूरत का आकलन, वैकल्पिक जलस्रोतों की सूची, टैंकरों की उपलब्धता, पाइपलाइन की स्थिति और दूरस्थ बस्तियों तक पानी पहुंचाने की कार्ययोजना पहले तैयार होनी चाहिए। जहां नए जलस्रोत या अतिरिक्त पाइपलाइन की जरूरत है, वहां काम पहले शुरू होना चाहिए। 202 बांधों का खाली रह जाना सरकार और समाज दोनों के लिए चेतावनी है। मानसून हर साल एक जैसा नहीं होता। इसलिए एक अच्छे मानसून की उम्मीद के भरोसे रहना समझदारी नहीं होगी। जलसंकट जब दरवाजे पर पहुंचता है, तब इंतजाम करने में देर हो चुकी होती है। खासकर राजस्थान जैसे राज्य में, जहां पानी जीवन, खेती और पशुधन- तीनों का आधार है। सरकार को जलसंकट से निपटने की स्पष्ट कार्ययोजना बनानी होगी।

sandeep.purohit@in.patrika.com

Updated on:
03 Oct 2026 05:38 pm
Published on:
03 Oct 2026 05:38 pm