
चिता। फाइल फोटो- पत्रिका
संदीप पुरोहित
कल एक श्मशान घाट गया था। एक साथी की माताजी को अंतिम विदाई देने। श्मशान के मुख्य द्वार पर बड़े अक्षरों में एक जाति विशेष का नाम लिखा था। बस, यहीं से मन में एक सवाल कौंधा। क्या मरने के बाद भी जाति हमारा पीछा नहीं छोड़ती? जीवन भर तो हम जाति के नाम पर बंटे रहते हैं, लेकिन मृत्यु के बाद भी अलग-अलग श्मशान! केवल अलग-अलग जातियों के ही नहीं, बल्कि कई जगह एक ही जाति की उपजातियों के भी अलग श्मशान हैं। ब्राह्मण, राजपूत, जाट, वैश्य, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग-लगभग हर समुदाय का अपना अलग श्मशान।
आखिर ऐसा क्यों? जिस मृत्यु को भारतीय दर्शन अंतिम सत्य मानता है, जो हर मनुष्य को समान बना देती है, वहां भी हम समान नहीं हो पाए। क्या अंतिम विदाई भी एक ही स्थान से नहीं हो सकती? क्या चिता की अग्नि भी जाति पूछती है? क्या राख का भी कोई गोत्र होता है? विडंबना देखिए, जिस देश ने 'वसुधैव कुटुम्बकम' का संदेश दिया, उसी समाज में मृत्यु के बाद भी दीवारें खड़ी हैं। यह केवल श्मशान की दीवार नहीं, हमारी सोच की दीवार है। यह विभाजन केवल श्मशान तक सीमित नहीं है। हमारे सामाजिक व्यवहार, रिश्तों और सार्वजनिक जीवन में भी इसकी छाया दिखाई देती है। हम आधुनिक होने का दावा करते हैं, विज्ञान और तकनीक में नई ऊंचाइयों की बात करते हैं, लेकिन मन के भीतर सदियों पुरानी दीवारों को अब भी ढो रहे हैं। विकास केवल ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों और तेज इंटरनेट का नाम नहीं है। उसका सबसे बड़ा पैमाना इंसान की सोच होती है। श्मशान में खड़े-खड़े एक और विचार आया। हर अंतिम संस्कार में बड़ी मात्रा में लकड़ी जलती है।
हर वर्ष इसके साथ असंख्य पेड़ भी समाप्त हो जाते हैं। यदि किसी कारण से लोग विद्युत शवदाह गृह का उपयोग नहीं करना चाहते, तो कम से कम ऐसे विकल्पों पर गंभीरता से विचार होना चाहिए जो पर्यावरण पर कम बोझ डालें। जहां संभव हो, कंडों जैसे पारंपरिक विकल्पों को भी बढ़ावा दिया जा सकता है। परंपरा और प्रकृति के बीच संतुलन बनाने का समय आ गया है। लेकिन असली सवाल केवल श्मशान का नहीं, हमारी मानसिकता का है। हम कब तक अपनी पहचान को जातियों के खांचों में सीमित रखेंगे? कब तक किसी इंसान का मूल्यांकन उसके जन्म से करेंगे?
यदि जन्म और मृत्यु-जीवन के दो सबसे बड़े सत्य भी हमें बराबरी का एहसास नहीं करा पा रहे, तो सामाजिक समरसता के हमारे दावे कितने सच्चे हैं? आज आवश्यकता केवल व्यवस्थाएं बदलने की नहीं, सोच बदलने की है। समाज को छोटे-छोटे खांचों से निकालकर व्यापक मानवीय दृष्टि की ओर ले जाने की है। अपने बच्चों को जाति से पहले इंसान बनना सिखाने की है, ताकि वे पहचान जन्म से नहीं, कर्म से करें। परिवर्तन कानूनों से नहीं, विचारों से शुरू होता है। शायद समय आ गया है कि श्मशान के फाटकों से जातियों के बोर्ड उतरने शुरू हों। जिस दिन ऐसा होगा, उसी दिन हमारे मन की दीवारें भी दरकने लगेंगी। और जिस समाज में मृत्यु सबको एक कर दे, वही समाज जीवन में भी सच्चे अर्थों में एक हो सकेगा।
sandeep.purohit@in.patrika.com
Updated on:
03 Oct 2026 05:22 pm
Published on:
03 Oct 2026 05:22 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
