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निगहबान- प्रदूषित पानी की हर बूंद का हिसाब मांगेगी पीढ़ियां

जोजरी में गिरने वाली प्रदूषित पानी की हर बूंद आने वाल पीढ़ियों को बर्बादी की ओर धकेलने वाला एक खतरनाक कदम है।
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Jojri river

संदीप पुरोहित
नदियां जीवनदायिनी होती हैं। जीवन की सरिता भी उसी के सहारे बहती है। जब वह प्रदूषित हो जाती है तो पूरा इको सिस्टम दम तोड़ने लगता है। जोजरी के लगातार प्रदूषित होने के बाद यही हालात हो गए हैं। यह केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि पर्यावरण, खेती और जीवन का आधार है। वर्षों से यह नदी औद्योगिक प्रदूषण का बोझ ढोह रही है। प्रदूषण केवल नदी को नहीं मारता, बल्कि उससे जुड़ी पूरी जीवन श्रृंखला को प्रभावित करता है। खेतों तक पहुंचने वाला दूषित पानी मिट्टी की उर्वरता घटाता है, फसलों की गुणवत्ता खराब करता है और धीरे-धीरे भूजल को भी जहरीला बना देता है।

किसान जिस पानी से सिंचाई करते हैं, वही पानी अंतत: लोगों की थाली तक पहुंचता है। इसलिए यह मामला सीधे हमारे जन स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा का भी है। राजस्थान पत्रिका अपने अभियान के जरिए जोजरी को प्रदूषण मुक्त करने की आवाज उठाता रहा है, पर जब बाड़ ही खेत खाने लग जाए तो खेत की रखवाली कौन करे? गुरुवार को जो खुलासा हुआ है, उसने व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित कमेटी ने नदी में सीधे प्रदूषित पानी डालती पाइप लाइन पकड़ी है। चार किलोमीटर लंबी पाइपलाइन उखाड़ी गई, जिनके जरिए फैक्ट्रियों का बिना ट्रीट किया हुआ जहरीला पानी सीधे नदी में छोड़ा जा रहा था। सबसे ङ्क्षचताजनक बात यह रही कि यह पूरा खेल उसी सीईटीपी प्रबंधन की ओर से किया जा रहा था, जिसकी जिम्मेदारी प्रदूषित पानी का उपचार कर पर्यावरण को सुरक्षित रखना था।यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं है। बल्कि भविष्य के साथ किया जा रहा अपराध है। मुनाफे के लिए भविष्य को दाव पर लगाना कहां तक उचित है।

जोजरी में गिरने वाली प्रदूषित पानी की हर बूंद आने वाल पीढियों को बर्बादी की ओर धकेलने वाला एक खतरनाक कदम है। सुप्रीम कोर्ट की हाई पॉवर कमेटी के कारण ही कार्रवाई के बाद सरकार ने फौरी कार्रवाई करते हुए दो लोगो को निलंबित किया है और एक अधिकारी को एपीओ कर इतिश्री कर ली है। दोषियों के खिलाफ एफआइआर दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू हुई है। यह एक अच्छा कदम है, पर ध्यान रहे इसमें कोई लूपोल नहीं रहे। दोषियों को सजा मिलनी ही चाहिए। यह कार्रवाई जरूरी थी, क्योंकि लंबे समय से शिकायतों और न्यायालयों की सख्ती के बावजूद स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो रहा था। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और उच्च न्यायालय पहले भी कई बार कठोर टिप्पणियां कर चुके हैं।

अब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान न्यायाधीश संदीप मेहता द्वारा जताई गई नाराजगी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पर्यावरण के साथ इस तरह का खिलवाड़ अब अधिक समय तक बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। फिलहाल कॉमन इफ्लूंट ट्रीटमेंट प्लांट का संचालन और कपड़ा उद्योगों की इकाइयों को बंद रखने के आदेश हुए हैं। जोधपुर में वर्तमान में 300 से अधिक टेक्सटाइल इकाइयां संचालित हैं। सांगरिया स्थित ईटीपी प्लांट की क्षमता 18 एमएलडी बताई जाती है। उद्योग और पर्यावरण को आमने-सामने खड़ा करके समाधान नहीं निकलेगा।

उद्योग बंद होंगे तो हजारों परिवारों की रोजी-रोटी प्रभावित होगी। लेकिन यदि प्रदूषण नहीं रुका तो उसका नुकसान उससे कहीं अधिक व्यापक और स्थायी होगा। अब आवश्यकता संतुलित और स्थायी समाधान की है। हर उद्योग से निकलने वाले पानी की हर बूंद की रियल टाइम मॉनिटङ्क्षरग होनी चाहिए। ट्रीटमेंट प्लांट की कार्यप्रणाली पूरी तरह पारदर्शी बनाई जाए और उसकी निगरानी केवल कागजों में नहीं, तकनीक के जरिए लगातार हो। पाइपलाइन नेटवर्क का नियमित ऑडिट हो तथा किसी भी स्तर पर लापरवाही पाए जाने पर सीधे आपराधिक जिम्मेदारी तय की जाए। यह ध्यान रहे कि जोजरी का अस्तित्व पूरे क्षेत्र के परिस्थितिकी तंत्र से जुड़ा है। अब आधे-अधूरे प्रयास नहीं, बल्कि स्थायी कार्रवाई का समय है। वरना आने वाली पीढिय़ां हमें माफ नहीं करेगी, वे इसके दंश को भोगेगी तो प्रदूषित पानी की हर बूंद का हिसाब मांगेगी।
sandeep.purohit@in.patrika.com

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