
पीपाड़सिटी (जोधपुुुुर). पंचायत समिति क्षेत्र के रतकुडिय़ा गांव की एक कोरोना संदिग्ध महिला की मौत के बाद उसके चार बच्चों का जीवन अब नेगेटिव बनता दिख रहा हैं। हालात ये है कि सरकारी योजनाओं में चयन से वंचित बेसहारा बच्चों के सिर से पहले पिता का साया उठा, अब कोरोना ने मजदूर मां का आंचल भी छीन लिया।
जानकारी के अनुसार रतकुडिय़ा गांव की कोजूड़ी देवी की गत दिनों जोधपुर में सांस की तकलीफ से उपचार के दौरान मौत हो गई। संदिग्ध कोविड मरीज की श्रेणी में मानते हुए शव पीपीइ किट में भेजा गया था। पांच वर्ष पहले कोजूड़ी देवी के पति ट्रक चालक ओमप्रकाश मेघवाल की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी।
ऐसे में विधवा कोजूड़ी नरेगा में मजदूरी करने के साथ कभी निर्माण कार्य तो कभी खेतिहर मजदूर के रूप में अपने दो-दो बेटे बेटियों का जैसे तैसे गुजारा चला रही थी। उसकी असमय मौत से अनाथ बच्चे कोरोना काल के लॉकडाउन में भुखमरी के शिकार होने को मजबूर हैं।
मां की सहायता के लिए छोड़ी पढ़ाई
पिता की सड़क दुर्घटना में असामयिक मृत्यु होने से अकेली हुई मां की मदद के लिए बड़े पुत्र जोगेश्वर ने स्नातक की पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर मजदूरी करनी शुरू कर दी। अब मां बाप दोनों के चले जाने से चारों बच्चों के लिए पहाड़ सा जीवन और उसमें में कोई सरकारी योजना का सहारा नही होने से भुखमरी की नौबत आने लगी हैं।
सरकारी योजनाओं से वंचित
इस परिवार की हालत देखने के बाद राज्य सरकार की कल्याण योजनाओं की पोल भी खुल जाती हैं। यह पीडि़त परिवार आज भी खाद्य सुरक्षा योजना के साथ स्वच्छ भारत मिशन से भी वंचित हैं। सामाजिक कार्यकर्ता गणपत मेघवाल नाडसर के अनुसार एक कमरे के घर और उसके आगे बने छप्पर को देखने से पीएम आवास योजना का लाभ सरकार विधवा कोजूड़ी को क्यों नही दे सकी, ये सवाल भी उठता हैं। मेघवाल ने बेसहारा बच्चों की मदद के लिए व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर सहायता अभियान शुरू किया हैं।
इनका कहना
गांव स्तर पर इन बेसहारा बच्चों की आर्थिक सहायता के लिए सामूहिक प्रयास किए जा रहे हैं।
वीरेन्द्र डूडी, सरपंच, रतकुडिय़ा।
कोविड काल में बेसहारा बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए जिला कलक्टर से जांच करवाकर रिपोर्ट मंगाई जाएगी। आयोग इन बेसहारा बच्चों की शिक्षा, पुनर्वास व रोजगार के लिए विशेष प्रयास कर लाभान्वित करेगा।
-संगीता बेनीवाल, अध्यक्ष, राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग,जयपुर।