जोधपुर

लो कर लो वर्क फ्रॉम होम, न खुशियां मिली, डिप्रेशन व थकावट के शिकार हुए अलग

Work from home - घर से काम करने वाले 19 प्रतिशत लोगों में आत्महत्या के लक्षण मिले, ऑफिस जाने वालों में नगण्य- डॉ एसएन मेडिकल कॉलेज ने उत्तरी भारत में कोविड प्रथम व द्वितीय फेज में घर व दफ्तर में काम करने वाले 200 लोगों पर किया शोध - इंजीनियर, बैंककर्मी, पुलिस, क्लर्क अन्य सरकारी दफ्तरों के कर्मचारी शामिल
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लो कर लो वर्क फ्रॉम होम, न खुशियां मिली, डिप्रेशन व थकावट के शिकार हुए अलग
लो कर लो वर्क फ्रॉम होम, न खुशियां मिली, डिप्रेशन व थकावट के शिकार हुए अलग

गजेंद्र सिंह दहिया

जोधपुर. कोविड-19 के दौरान वर्ष 2020 और 2021 में पूरी दुनिया में लाखों कर्मचारियों ने वर्क फ्रॉम होम (घर से काम) किया। ऐसा माना गया कि कर्मचारी घर में खुश रहेंगे और उत्पादकता बढ़ेगी लेकिन हुआ इसका उलट। डॉ सम्पूर्णानंद मेडिकल कॉलेज जोधपुर के अनुसार वर्क फ्रॉम होम ने कर्मचारियों में तनाव अधिक बढ़ाया। ऑफिस नहीं जाने के बावजूद उनमें घर बैठे-बैठे ही थकावट होने लगी। यहां तक की करीब 19 फीसदी वर्क फ्रॉम होम करने वाले कार्मिकों ने अपनी जान लेने की कोशिश की। दूसरी तरफ ऑफिस जाकर काम करने वाले अधिक तरोताजा मिले। उनमें तनाव का स्तर भी कम था। रिसर्च के अनुसार वर्क फ्रॉम होम करने वाले कार्मिक अपनी निजी और कामकाजी जिंदगी में सामंजस्य बैठाने में नाकाम रहे।

100 वर्क फ्रॉम होम व 100 दफ्तर के कर्मचारी चुने

मेडिकल कॉलेज के मनोविकार विभाग की ओर से किए गए शोध में कुल 200 कर्मचारी चुने गए। कॉलेज प्राचार्य डॉ दिलीप कच्छवाह ने बताया कि 100 कर्मचारी वर्क फ्रॉम होम और 100 ही कोविड में दफ्तर जाने वाले कर्मचारियों से ऑनलाइन सर्वे किया गया। अधिकांश कर्मचारी राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, मध्यप्रदेश जैसे उत्तरी राज्यों से चुने गए। वर्क फ्रॉम होम करने वालों में इंजीनियर व आइटी प्रोफेशनल्स अधिक थे। दफ्तर जाने वालों मेें अधिकांशत: बैंक कर्मचारियों व अन्य विभाग के कार्मिक शामिल किए।

इससे तो लगता है ऑफिस जाना ही ठीक

- वर्क फ्रॉम होम करने वाले 53 प्रतिशत में मॉडरेट डिप्रेशन दिखा। नियमित कार्मिकों में मॉडरेट डिप्रेशन केवल 2 फीसदी और लाइट डिप्रेशन 39 फीसदी मेें पाया गया।

- शारीरिक व मानसिक थकावट यानी बर्न ऑफ इंडेक्स वर्क फ्रॉम होम करने वाले 56 प्रतिशत लोगों में थकावट की उच्च डिग्री मिली, जबकि रेगुलर ऑफिस वर्कर्स में यह 23 फीसदी ही मिली।

- वर्क फ्रॉम होम करने वाले 66 प्रतिशत कर्मचारी घर बैठे-बैठे थकावट से चूर रहे। इनमें औसत या औसत से अधिक थकान मिली, जबकि ऑफिस जाने वालों में इसका प्रतिशत 47 है।

- वर्क फ्रॉम होम करने वाले 19.8 प्रतिशत में आत्महत्या के विचार आए जबकि ऑफिस जाने वालों में यह लगभग नगण्य रहा।

- आनंद की अनुभूति के मामले में दोनों ही खाली थे। वर्क फ्रॉम होम करने 73.3 प्रतिशत व ऑफिस जाने वाले 76 प्रतिशत का कहना था कि वे कोविड में चीजों का उतना आनंद नहीं ले पा रहे हैं।

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हमारा निष्कर्ष यह है कर्मचारियों को घर व दफ्तर से काम करते समय निजी व कामकाजी जीवन शैली के बीच सामंजस्य बैठाना आना चाहिए।

डॉ जीडी कूलवाल, मनोविकार विभाग, डॉ एसएन मेडिकल कॉलेज

Published on:
05 Sept 2022 09:33 pm