जोधपुर

राजस्थान में सामने आया बड़ा संकट: थार में पानी आने से लहलहाए खेत, लेकिन गायब हो रहे चरागाह

इंदिरा गांधी नहर के पानी से पश्चिमी राजस्थान में खेती और बागवानी का विस्तार हो रहा है। बाजरे से लेकर अनार और खजूर तक नई फसलें उगाई जा रही हैं, लेकिन प्राकृतिक चरागाह सिमटने और पारंपरिक वनस्पतियों पर असर पड़ने की चिंता भी बढ़ रही है।
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Oct 19, 2026
Rajasthan Biodiversity
इंदिरा गांधी नहर के पानी से पश्चिमी राजस्थान में बढ़ रही हरियाली और खेती-बागवानी का विस्तार (Photo-Patrika)

जोधपुर. पश्चिमी राजस्थान में पानी की उपलब्धता थार के भू-दृश्य को लगातार बदल रही है। नहरों से सिंचाई का दायरा बढ़ने के साथ खेती और बागवानी फैल रही है, जबकि प्राकृतिक चरागाह सिमट रहे है। इसके साथ ही मरुस्थल की पारंपरिक वनस्पतियों के बीच नई फसलों और पौधों का विस्तार भी हो रहा है। इंदिरा गांधी नहर का पानी आने के बाद पश्चिमी राजस्थान का रेगिस्तानी भू-दृश्य तेजी से बदल रहा है। पंजाब के हरिके बैराज से निकलने वाली नहर राजस्थान में प्रवेश कर पश्चिमी जिलों तक पहुंचती है। नहरी पानी से अब रेगिस्तान के कई हिस्सों में खेतों के साथ आसपास के इलाकों में भी हरियाली नजर आ रही है। थार की कम बारिश और कठोर जलवायु के अनुरूप सेवन, खेजड़ी, रोहिड़ा, कुमट, केर, फोग, आक, बेर, धामण और खींप जैसी वनस्पतियां यहां के प्राकृतिक तंत्र का हिस्सा है। सेवन के प्राकृतिक चरागाह पशुपालन के लिए खास महत्व रखते है। खेती का विस्तार होने से डुन चरागाहों का उपयोग बदल रहा है और कई जगह उनकी जमीन कृषि क्षेत्र में आ रही है।

बाजरे से अनार-जीरे तक पहुंच रही खेती

पानी मिलने के साथ पश्चिमी राजस्थान में फसल चयन भी बदल रहा है। वर्षा आधारित खेती में बाजरा, मूंग, मोठ, ग्वार और तिल जैसी फसलों के साथ अब गेहूं, सरसों, चना, जीरा, इसबगोल, मूंगफली, कपास और अरंडी की खेती हो रही है। सिंचित क्षेत्रों में सब्जियों के साथ अनार, खजूर, अंजीर, किन्नू, आंवला और अमरूद की बागवानी भी बढ़ रही है।

चरागाह घटने से पशुधन भी घटा

प्राकृतिक चरागाहों के सिमटने से पशुओं के लिए उपलब्ध पारंपरिक चारे का क्षेत्र भी कम हो रहा है। इसका असर पशुधन पर दिखाई दे रहा है। मारवाड़ का पशुधन अपनी नस्ल और उपयोगिता के लिए देश-दुनिया में पहचान रखता है, लेकिन चरागाहों में कमी के साथ इसकी संख्या भी घट रही है।

बिगड़ रहा संतुलन

वनस्पति तंत्र में यह बदलाव चारे की उपलब्धता और स्थानीय जैव विविधता को प्रभावित कर रहा है। लंबे समय में इससे मिट्टी, वनस्पति और पशुधन के बीच बना पारंपरिक संतुलन भी बदल सकता है। सिंचाई वाले कुछ क्षेत्रों में जलभराव और मिट्टी में लवणीयता की समस्या भी सामने आ रही है। दूसरी ओर, पानी की उपलब्धता किसानों को अधिक फसलें लेने और बागवानी का विस्तार करने का अवसर दे रही है। इस तरह थार में पानी के साथ खेती का स्वरूप ही नहीं, जमीन के उपयोग और प्राकृतिक भू-दृश्य का स्वरूप भी बदल रहा है।

विलायती बबूल का दंश

खेती के विस्तार के साथ जैसलमेर सहित पश्चिमी राजस्थान के कुछ हिस्सों में विलायती बबूल का फैलाव भी बढ़ रहा है। इसके घने क्षेत्रों में स्थानीय वनस्पतियों के लिए जगह कम हो रही है। इसके फैलाव से जमीन की प्राकृतिक वनस्पति संरचना भी प्रभावित हो रही है।

Updated on:
19 Oct 2026 10:55 am
Published on:
19 Oct 2026 10:49 am
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