
NAND KISHORE SARASWAT
जोधपुर. घण्टाघर जोधपुर सरदार मार्केट के मध्य ऐतिहासिक घण्टाघर की 110 साल पुरानी घड़ी के सुइयां पिछले एक सप्ताह से अटकी पड़ी है। प्रत्येक घंटे बाद में आठ टंकोरे बजाने वाली घड़ी के खराब कलपुर्जे दुरुस्त होने में पांच से सात दिन तक समय लग सकता है।
तत्कालीन बम्बई की कंपनी ल्यूण्ड एण्ड ब्लॉक्ली टरेट क्लॉकमैन कंपनी से 1911 में घंटाघर की घड़ी खरीदी गई थी । घण्टाघर की घड़ी का रख - रखाव पहले पीडब्ल्यूडी के जिम्मे था लेकिन वर्ष 1959 में राजस्थान सरकार के आदेश पर घड़ी रख-रखाव का कार्य म्यूनिसीपल विभाग को सौंप दिया गया ।
सप्ताह में एक बार भरी जाती चाबी
घड़ी में चाबी सप्ताह में एक बार भरी जाती है । इसमें तीन भारी लोहे की ईंटें लगी हैं जो 15 मिनट, आधा घण्टा और एक घण्टा से चलती है । इनका वजन क्रमश: 2, 1 और सवा क्विंटल है। घण्टाघर की ऊंचाई 98 फीट है और यह 1 मार्च सन 1912 को बनकर तैयार हुआ । इसका नक्शा वास्तुविद् एसएस जैकब ने बनाया था ।
सभी टंकारों की आवाज अलग
तीसरी मंजिल पर स्थित यांत्रिक कक्ष में दो बड़े लोहे के गर्डर पर घंटाघर की घड़ी स्थित है । इसकी लम्बाई 6 फुट एवं चौड़ाई 2 फुट है । यहीं पर इसका पैण्डुलम भी लगा है । इसका वजन 50 किलो है । प्रत्येक 15 मिनट पर घड़ी के टंकोरे बजते हैं । प्रत्येक घंटे में आठ बार टंकोरे बोलते हैं और सभी टंकारों की अलग - अलग आवाज होती है । इसमें घड़ी की चाबी का वजन 10 किलो है ।