
जोधपुर. शहर से 20 किमी. की दूरी पर स्थित सांगरिया गांव में शोभावत भगवानदास का 198 वर्ष प्राचीन स्मारक स्थल खोजने में महत्वपूर्ण सफलता मिली है। महाराजा मानसिंह के समय जयपुर राज्य की ओर से जोधपुर घेराव के समय भगवानदास ने महत्वपूर्ण भूमिका के साथ सराहनीय योगदान दिया था। यही भगवानदास महाराजा भींवसिंह और फि र महाराजा मानसिंह की सेवा में रहे थे। इतिहास के पन्नों से ज्ञात होता है कि भगवानदास के पूर्वजों को ही सांगरिया के साथ भांडू गांव पट्टे में मिला था।
महाराजा मानसिंह के खास सेवादार शोभावत खींवकरण के पुत्र भगवानदास की स्मृति में सांगरिया गांव में निर्मित 14 खम्भों की विशाल छतरी इन दिनों ध्वस्त होने के कगार पर है। कलात्मक छतरी का गुम्बज का अधिकांश हिस्सा टूट चुका है। स्मारक स्थल पर संगमरमर से निर्मित देवली से ज्ञात होता है कि भगवानदास का निधन विक्रम संवत 1878 तदनुसार सन 1821 में हुआ था। इसी स्मारक के पास 16 वीं शताब्दी का कीर्ति स्तंभ मिला है। मारवाड़ की ठिकाणों की ख्यातों से ज्ञात होता है कि शोभावत भगवानदास को महाराजा मानसिंह की ओर से मरदाना दोढ़ी की दारोगाई का पद मिला हुआ था। शोभावतों को जोधपुर राज्य की सेवा में रहते हुए समय-समय पर ड्योढ़ीदार पद के अलावा सिकदार, हाकम, कोतवाल, रसोड़ों की दारोगाई, मोदी खाने, कोतवाली जैसे प्रतिष्ठित पद भी मिले थे।
स्मारक मिलने से कई पहलु आएंगे सामने
सांगरिया के स्मारक में मिले देवली के अभिलेख के अनुसार भगवानदास के साथ ठकुराणी चवाण (चौहान) ने भी देह त्याग दिया था। सांगरिया में स्मारक की प्रतिष्ठा उसके पुत्र रिणछोड़दास ने विक्रम संवत 1878, महावद दशमी गुरुवार के दिन की थी। इनका स्मारक स्थल मिल जाने से मारवाड़ राज्य के प्रशासनिक पदों पर कार्यरत औहदेदारों और उनके जीवन के कई पहलु सामने आ सकेंगे।
डॉ. विक्रमसिंह भाटी, सहायक निदेशक राजस्थानी शोध संस्थान चौपासनी जोधपुर.